विवाहोत्तर कुछ विधियां

बारात के घर आते ही वर-वधू के ऊपर दही-चावल फेरकर फेंके जाते हैं । घर में प्रवेश करते समय वधू प्रवेशद्वार पर रखे चावल से भरे पात्र को दाएं पैर के अंगूठे से लुढकाकर घर में प्रवेश करती है । तत्पश्चात लक्ष्मीपूजन कर वधू को ससुराल का नया नाम दिया जाता है ।

सात्त्विक आहार से परिवर्तन आने के विविध चरण

१. वैराग्य : उचित आहार से तेज के मार्ग से कोशिकाओं का पोषण होने लगने से संबंधित स्तर पर उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा संबंधित कोशिका केंद्र के स्तर पर घनीभूत होती है । इसी ऊर्जा से जीव की यात्रा वैराग्य की दिशा में होकर उसका परिणारम वासनारूपी आसक्ति त्यागने में होता है । २. देहबुद्धि का … Read more

शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर सात्त्विक आहार का महत्त्व !

सत्त्वगुण की वृद्धि करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाला सात्त्विक आहार !      ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।’, अर्थात साधना करने के लिए शरीर ही खरा महत्त्वपूर्ण माध्यम है; क्योंकि मनुष्यजन्म के अंतिम लक्ष्य ईश्वरप्राप्ति को साध्य करने हेतु मनुष्य को देह की अत्यंत आवश्यकता होती है । शरीर स्वस्थ रहने के लिए आहार अच्छा और … Read more

‘शाकाहार करना’ मनुष्य का धर्मपालन है ! ‘नर से नारायण’ बनाने का कार्य शाकाहार करता है !

     ‘शाकाहार से मनुष्य सत्त्वगुणी बनता है । सत्त्वगुण के संवर्धन से उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है, अर्थात नरजन्म का सार्थक करनेवाले सत्त्वगुणी आहार का सेवन करना धर्मपालन है । धर्मपालन का अर्थ है योग्य आचारसंहिता को स्वीकार कर, उस अनुसार आचरण कर धर्म को, परिणामस्वरूप ईश्वर को अच्छा लगना !      शाकाहार से … Read more

पोंछा लगाने के संदर्भ में आचार

यंत्र से भूमि पोंछते हुए शरीर अधिकांशतः झुका हुआ नहीं होता, हम खडे-खडे ही भूमि स्वच्छ करते हैं । ऐसे में शरीर की विशिष्ट मुद्रा के अभाव के कारण सूर्यनाडी जागृत नहीं होती । परिणामस्वरूप यंत्र से भूमि पोंछने के कृत्य द्वारा निर्मित कष्टदायक तरंगों से देहमंडलकी भी रक्षा नहीं हो पाती ।

देहली के साधक दंपति श्री. संजीव कुमार (आयु ७० वर्ष) एवं श्रीमती माला कुमार (आयु ६७ वर्ष) सनातन के ११५ वें और ११६ वें समष्टि संतपद पर विराजमान !

इस दंपति ने एकत्रित रूप से साधना का आरंभ किया । वर्ष २०१७ में एक ही दिन इन दोनों का आध्यात्मिक स्तर ६१ प्रतिशत हुआ और आज के इस मंगल दिवस पर इन दोनों ने ७१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर एक ही दिन संतपद भी प्राप्त कर लिया है ।

दत्तात्रेय की त्रिमुखी मूर्ति के हाथ में रहा कमंडल (त्याग और चैतन्य का प्रतीक)

ईश्वर के निर्गुण तरंगों को समाहित करनेवाले, एवं अनिष्ट शक्तियों के कष्ट से रक्षण होने के लिए संपूर्ण त्रिलोक को एक ही समय एक पल में मंडल निकालने की क्षमता रखनेवाला जल जिस कुंड में सामाहित हैं, वह कुंड अर्थात दत्तात्रेय के हाथ में विद्यमान कमंडलू ।

सनातन की संत श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में उनके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !

प्रत्येक कर्म को नाम से जोडें, तो वह कर्मयोग बन जाता है । नामजप करनेवाले मन को भाव के दृश्य में रमा दिया जाए, तो वह भक्तियोग और मन एवं बुद्धि नामजप के साथ चलने लगे, तो वह ज्ञानयोग होता है ।

ईश्वरीय गुण का अर्थ सूक्ष्म के आभूषण !

जीव द्वारा ईश्वर निर्मित धर्म का आचरण और यथार्थ पालन करना, अर्थात जीव द्वारा उसके प्रगति हेतु उपयुक्त साधना कर इस मनुष्यजन्म का सार्थक करना, यही उसके जीवन का बडा अलंकार हो सकता है ।

श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के अमृतवचन

प्रारब्ध कितना भी कठिन हो, भगवान से आंतरिक सान्निध्य बनाए रख, उचित क्रियमाण का उपयोग कर कर्म करनेसे उस पर मात की जा सकती है ।