काल की आवश्यकता समझकर राष्ट्र तथा धर्मरक्षा की शिक्षा देना, यह गुरु का वर्तमान कर्तव्य !

राष्ट्र तथा धर्मरक्षा की शिक्षा देनेवाले गुरुओं के कार्य का स्मरण कीजिए !

१२ से १८ जून की अवधि में गोवा में होनेवाले दशम ‘अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन’ के उपलक्ष्य में …

इस्लामी अथवा ईसाई देशों की भांति हिन्दू राष्ट्र कोई संकीर्ण अवधारणा (संकल्पना) नहीं है, अपितु वह विश्वकल्याण का विचार करनेवाली, प्रत्येक नागरिक की लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति का विचार करनेवाली एक सत्त्वप्रधान व्यवस्था है ।

आपातकाल में देवता की कृपा कैसे प्राप्त करनी चाहिए ?

हमें अपने रसोईघर को ‘अन्नपूर्णा कक्ष’ बना देना चाहिए । रसोईघर में अन्न का अभाव पड सकता है । अन्नपूर्णा कक्ष में संपूर्ण ब्रह्मांड का पोषण करनेवाली माता अन्नपूर्णा विराजमान होती है । उसके कारण वहां कभी भी किसी बात का अभाव नहीं होता ।

सनातन की ग्रन्थमाला : राष्ट्र एवं धर्म रक्षा

अंग्रेजोंकी मैकॉले प्रणित शिक्षाप्रणालीके दुष्परिणाम तथा पश्चिमी संस्कृतिका आक्रमण रोकने हेतु उपाय बतानेवाले जून २०१२ के ‘प्रथम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन’ के मान्यवरोंके व्याख्यानोंसे युक्त ग्रन्थ !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी एवं श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के भ्रूमध्य पर दैवी चिन्ह अंकित होने का अध्यात्मशास्त्र !

आध्यात्मिक गुरुओं का कार्य जब ज्ञानशक्ति के बल पर चल रहा होता है, तब उनके सहस्रारचक्र की ओर ईश्वरीय ज्ञान का प्रवाह आता है और वह उनके आज्ञाचक्र के द्वारा वायुमंडल में प्रक्षेपित होता है ।

सनातन संस्था द्वारा ग्रंथ-प्रदर्शनी

दिल्ली – यहां पर वनिता समाज की ओर से चैत्रोत्सव के अवसर पर हलदी-कुमकुम के कार्यक्रम में सनातन संस्था द्वारा ग्रंथ व सात्त्विक उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई गई । इसका लाभ अनेक महिलाओं ने लिया ।

अल्प आयु में अत्यधिक प्रगल्भ विचारोंवाली फोंडा (गोवा) की ६६ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कु. श्रिया राजंदेकर (आयु १० वर्ष) !

‘प्रत्येक को उनके कर्माें का फल और प्रारब्ध भोगकर कब प्रगति करनी है ?’, यह बात भगवान द्वारा निश्चित की गई है । हम उसमें कुछ नहीं कर सकते । हमें उनकी ओर साक्षीभाव से देखना होगा ।

अक्षय तृतीया के पर्व पर ‘सत्पात्र को दान’ देकर ‘अक्षय दान’ का फल प्राप्त करें !

हिन्दू धर्म के साढे तीन शुभमुहूर्ताें में से वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया एक है । इसीलिए इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं । इस तिथि पर कोई भी समय शुभमुहूर्त ही होता है । इस वर्ष ३ मई २०२२ को अक्षय तृतीया हैं ।

विवाहोत्तर कुछ विधियां

बारात के घर आते ही वर-वधू के ऊपर दही-चावल फेरकर फेंके जाते हैं । घर में प्रवेश करते समय वधू प्रवेशद्वार पर रखे चावल से भरे पात्र को दाएं पैर के अंगूठे से लुढकाकर घर में प्रवेश करती है । तत्पश्चात लक्ष्मीपूजन कर वधू को ससुराल का नया नाम दिया जाता है ।

विवाहसंस्कार शास्त्र एवं वर्तमान अनुचित प्रथाएं

वधू को पिता के घर से अपने घर ले जाना अर्थात ‘विवाह’ अथवा ‘उद्वाह’ है । विवाह अर्थात पाणिग्रहण, अर्थात वर द्वारा स्त्री को अपनी पत्नी बनाने के लिए उसका हाथ पकडना । पुरुष स्त्री का हाथ पकडता है; इसलिए विवाह उपरांत स्त्री पुरुष के घर जाए । पुरुष का स्त्री के घर जाना अनुचित है ।