वर्षश्राद्ध करने के उपरांत पितृपक्ष में भी श्राद्ध क्यों करें ?
वर्षश्राद्ध करने से उस विशिष्ट लिंगदेह को गति मिलती है, जिससे उसका प्रत्यक्ष व्यष्टि स्तर का ऋण चुकाने में सहायता मिलती है ।
वर्षश्राद्ध करने से उस विशिष्ट लिंगदेह को गति मिलती है, जिससे उसका प्रत्यक्ष व्यष्टि स्तर का ऋण चुकाने में सहायता मिलती है ।
ब्रह्मदेव इच्छाशक्ति से संबधित होते हैं । अतः स्वयं को ब्रह्मात्मक इच्छा-ऊर्जा का अंश समझकर आवाहन करने से ब्रह्माण्ड की इच्छातरंगें कार्यरत होती हैं ।
नवमी के दिन ब्रह्माण्ड में रजोगुणी पृथ्वी एवं आप तत्त्वों से संबधित शिवतरंगों की अधिकता होती है…
‘तीर्थ की अपेक्षा घर में आठ गुना पुण्य प्राप्त होता है ।’
परिवार में जिस व्यक्ति के पिता अथवा माता की मृत्यु हो गई हो, उस श्राद्धकर्ता को माता अथवा पिता के लिए उनके देहान्त के दिन से आगे एक वर्ष तक महालय श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती
‘आषाढ माह के शुक्ल पक्ष की ‘देवशयनी’ एकादशी से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की ‘देवउठनी’ एकादशी तक की चार महिने की अवधि को चातुर्मास माना जाता है । चातुर्मास में भजन, ध्यान, जप, स्वाध्याय (पाठ), मौन रहना एवं स्मरण करना अधिक हितकारी है ।
विवाह, वैवाहिक संबंध, गर्भधारण, वंशवृद्धि आदि में बाधा होना, मंदबुद्धि या विकलांग संतान होना, शारीरिक रोग, व्यसनादि समस्याएं हो सकती हैं । इन समस्याओं के समाधान हेतु कष्ट की तीव्रता के अनुसार ‘श्री गुरुदेव दत्त’ (दत्तात्रेय देवता का) जप प्रतिदिन करें ।
‘भगवान की निर्गुण तरंगों को स्वयं में समा लेनेवाला तथा अनिष्ट शक्तियों को दूर करने के लिए एक ही पल में पूरे त्रिलोक को एक ही मंडल में खींचने की क्षमता से युक्त जल जिस कुंड में है, वह कुंड है भगवान दत्तात्रेय के हाथ में पकडा कमंडलु ।
प्राचीन काल में तुलसी जी को जल चढाकर वंदन किया जाता था; परन्तु आज अनेक लोगों के घर तुलसीवृन्दावन भी नहीं होता । प्राचीन काल में सायंकाल दीपक जलाकर ईश्वर के समक्ष स्तोत्र पठन किया जाता था; परन्तु आज सायंकाल बच्चे दूरदर्शन पर कार्यक्रम देखने में मग्न रहते हैं ।