हिन्दुओ, तृतीय विश्वयुद्ध के दुष्परिणाम टालने के लिए यज्ञसंस्कृति का पुनरुत्थान करो !

यज्ञ आध्यात्मिक बल प्राप्त करने का सुलभ माध्यम है । उसके कारण ही प्राचीन काल से ‘यज्ञ करना’ वांछित फलप्राप्ति एवं आपत्ति निवारण का सुलभ मार्ग है । अत: यज्ञ का बडा महत्त्व है ।

राजमातंगी देवी की उपासना का कला की दृष्टि से महत्त्व

१४ विद्याओं और ६४ कलाओं का उद्गम स्थान है भारत ! आकाश में अनंत तारे हैं । रात्रि के समय यदि हम स्वच्छ आकाश को देखें, तो अनेक नक्षत्र और तारे दिखाई देंगे । ये तारे और नक्षत्र संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशमान करते हैं ।

आध्यात्मिक उपचारों के संदर्भ में यह ध्यान रखें !

आध्यात्मिक उपचार के रूप में नामजप करनेवाले साधक आरंभ में प्राणशक्ति प्रणाली के अनुसार ढूंढा हुआ नामजप कर उसके उपरांत रामनाम का नामजप करें

श्री राजमातंगी देवी की उपासना का वाणी की दृष्टि से महत्त्व

मातंगी ‘वैखरी’ शब्द (वाणी) की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए उन्हें ‘वाक् विलासिनी’ (अपने लेखन अथवा वाणी से दूसरों का ध्यान आकर्षित करने की शक्ति) माना जाता है । देवी के स्वरूप को देखें, तो देवी के हाथ में हमें तोता दिखाई देता है । तोता वाणी का प्रतीक है  ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !

गुरुदेवजी को देखकर सभी भावविभोर हो गए । उसी प्रकार, सभी को सामने देखकर गुरुदेवजी के मुखमंडल पर भी आनंद एवं कृतज्ञभाव दिखाई दे रहा था । महोत्सव अंतर्गत गुरुदेवजी की यह अत्यंत मनमोहक भावमुद्रा है !

ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

गुरु का वास्तविक स्वरूप केवल उनके मानवी अथवा सगुण देह तक सीमित नहीं होता । गुरु मूलतः एक ‘निर्गुण’ तत्त्व हैं । निर्गुण रूप में गुरु आकाश के समान अथाह, अनंत एवं सर्वव्यापी होते हैं । उन्हें स्थल, काल अथवा समय की कोई मर्यादा नहीं होती ।

सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !

जिस-जिस समय साधक संकट में होता है, उस समय उसे संभालनेवाले हाथ गुरु के ही होते हैं और जब साधक आनंदी होता है, तब उस आनंद का मूल भी गुरु ही होते हैं । इस प्रकार सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी साधकों को दिए गए अपने आशीर्वचन का क्षण-क्षण पालन कर रहे हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?

सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी पर जिनकी श्रद्धा है, वे उन्हें ‘अवतारी पुरुष’ मानते हैं । सनातन के साधक उन्हें गुरुस्थान पर मानते हैं तथा ‘उनके समान गुरु कहीं नहीं देखे’, ऐसा उनका भाव है ।

सनातन आश्रम, रामनाथी के भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ ‘आयुष्य होम’ !

‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का महामृत्युयोग टले एवं उन्हें उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त हो, साथ ही साधकों को भी उत्तम स्वास्थ्य मिले एवं उनकी साधना अच्छे से होकर उनकी रक्षा हो’, इस उद्देश्य से सप्तर्षि जीवनाडी-पट्टिका में किए उल्लेख के अनुसार, यहां सनातन आश्रम में ८ मई को ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ ।

साधकों को स्वभावदोष एवं अहं के निर्मूलन की प्रक्रिया सिखाकर स्वसूचनाओं के द्वारा स्वभावदोषों पर विजय प्राप्त करने का मार्गदर्शन करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी !

मेरे मन पर बचपन में घटित कुछ प्रसंगों का परिणाम हुआ था, इसलिए मेरे मन में असुरक्षा की सुप्त भावना थी । सनातन संस्था के मार्गदर्शन में साधना आरंभ करने पर प्रत्येक प्रसंग में प.पू. डॉक्टरजी ने (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी ने) मुझे सदैव आधार देकर उन प्रसंगों से मुझे संवारा ।