
१. ऋषि-मुनियों द्वारा दाढी बढाने केकारण वर्तमान के युवाओं द्वारा भी दाढी बढाना
‘वर्तमान में अनेक युवकों की दाढी बढी हुई दिखाई देती है । वास्तव में युवाओं को दाढी नहीं बढानी चाहिए । एक युवक ने मुझसे पूछा, ‘‘दाढी क्यों नहीं बढानी चाहिए ? पूर्व काल में ऋषि-मुनियों ने भी दाढी बढाई ही थी न !’’ मैंने उससे कहा, ‘‘आप यह देखते हैं कि ऋषि-मुनियों ने भी दाढी बढाई थी; परंतु क्या आप उनके द्वारा की गई साधना करते हैं ? आप उनकी भांति केवल दाढी बढाते हैं; परंतु कोई साधना नहीं करते । साधना करने के कारण दाढी से निर्मित होनेवाला मनुष्य पर रज-तम का प्रभाव नष्ट हो जाता है । साधना से पंचमहाभूतों पर भी अधिकार प्राप्त होता है ।’’
२. समाज की युवतियों द्वारा ‘दुर्गादेवी ने केश खुले छोडे हैं’, ऐसा कहकर स्वयं के केश भी खुले छोडना
‘समाज में अनेक लडकियां केश खुले छोडकर घूमती हुई दिखाई देती हैं । यदि हम उनसे कहें कि ‘केश खुले मत छोडो’, तो वे तुरंत कहती हैं कि ‘दुर्गादेवी के केश भी तो खुले रहते हैं न ?’ दुर्गादेवी केश कब खुले छोडती हैं, जब महायुद्ध आरंभ होता है तब ! दुर्गादेवी का तमोगुण कार्यरत होता है । तब वे ‘रणचंडी’ बनती हैं और अपने केश खुले छोडती हैं ! यह रणचंडी का रूप उनका मारक तत्त्व होता है ।’’ साधकों को इस प्रकार के सभी उत्तर ज्ञात होने चाहिए, जिससे योग्य स्थान पर हम इस विषय में धर्मशिक्षा देकर ‘हिन्दू धर्म व योग्य मार्ग से की गई साधना’ पर उनकी श्रद्धा सुदृढ कर सकें !’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ, कांचीपुरम्, तमिलनाडु. (२१.९.२०२५)
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