
एक साधक : मुझमें स्वभावदोष हैं ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवले : लोग संतों की बात सुनते हैं । यदि हममें स्वभावदोष होंगे, तो हमारी बात कौन सुनेगा ? हमारी वाणी में चैतन्य आना चाहिए ।
एक साधिका : अपनी छवि बनाए रखने का भाग होता है । साधकों को उनकी गलतियां नहीं बता पाती ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवले : ईश्वर सब जानते हैं न ? तो बताना चाहिए । साधकों को स्थूल स्तर पर बताना चाहिए । जो बोलते नहीं हैं, उन्हें अपनी प्रगति के लिए अपना प्रत्येक विचार और प्रत्येक गलती बताना आवश्यक है ।
एक साधिका : सेवा समर्पणभाव से हो, इसके लिए प्रार्थना करती हूं ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवले : ऐसा नहीं होना चाहिए कि ‘मैं कोई प्रयास ही नहीं करूंगी, केवल प्रार्थना करूंगी ।’ इसके लिए संत अथवा ईश्वर से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए । क्रियात्मक स्तर पर प्रयास करने चाहिए । अभ्यास और परिश्रम से ही शरीर तैयार होता है ।
एक साधक : सेवा और घर के कार्यों का नियोजन व्यवस्थित रूप से नहीं हो पाता ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवले : पूछकर कदम उठाने चाहिए । व्यवहार में हम डॉक्टरों और अधिवक्ताओं से पूछते हैं न ? फिर साधना में उत्तरदायी साधकों से क्यों नहीं पूछते ? यह गंभीर चूक है । पूछना अथवा मन खोलकर बात करना नहीं होगा, तो प्रगति नहीं होगी । केवल प्रशिक्षण हो जाएगा । बाकी क्या ? सब कुछ शारीरिक स्तर तक सीमित रह जाएगा; परन्तु उसका उपयोग नहीं है ।
एक साधक : मुझसे साधना के अधिक प्रयास नहीं हो पाते ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवले : १५ – २० वर्ष साधना करने पर तुम अर्जुन के समान हो जाओगे । पूर्वजन्म के प्रारब्ध को नष्ट करने के लिए साधना का उपयोग होता है ।
एक साधक : हम रामनाथी आने के लिए निकलनेवाले थे, उसी दिन जिले में कर्फ्यू लगने वाला था । सद्गुरुओं द्वारा बताए अनुसार हम तुरंत निकले । हमारे निकलने के एक घंटे के भीतर ही वहां कर्फ्यू लग गया ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी : संतों के विषय में लिखकर दो, जिससे समाज को संतों का महत्त्व समझ में आए ।
एक साधक : पहले मैं रामनाथी आश्रम में था । तब मुझसे भाववृद्धि के लिए अच्छे प्रयास होते थे । प्रसार में जाने के उपरांत भाववृद्धि के प्रयास कम हो गए; किन्तु प्रसार के माध्यम से समष्टि सूत्र सीखने को मिले ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी : हमें रामनाथी आश्रम के समान सर्वत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करनी है ।
एक साधक : स्वयं के विषय में नकारात्मक विचार आते हैं ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी : समाज के रज-तम प्रधान वातावरण का प्रभाव होता है। समष्टि साधना के साथ व्यष्टि साधना भी जोडनी चाहिए । नामजप को प्राथमिकता देनी चाहिए ।
एक साधक : सेवा में बोलने का भाग कम होता है । उत्तरदायी साधक और सहसाधक मार्गदर्शन करते हैं । सहसाधकों के प्रयास देखकर अब मेरे भी प्रयास प्रारंभ हुए हैं ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी : ईश्वर तक पहुंचना है, तो सबके साथ संवाद करना चाहिए ।
एक साधक : पिछली बार जब यहां आया था, तब का आनंद अलग था । अब अगले चरण की बातें सीखने के लिए मिल रही हैं ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी : पहली बार जो सीखा था, उसे यदि प्रयासों में उतारोगे, तो दूसरी बार और अधिक आनंद मिलेगा ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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