परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों को किया गया अनमोल मार्गदर्शन !
हमें रामनाथी आश्रम के समान सर्वत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करनी है ।
हमें रामनाथी आश्रम के समान सर्वत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करनी है ।
‘द्वेष करना’, यह स्वभावदोष क्यों उत्पन्न होता है ? उसका प्रकटीकरण कैसे होता है ? तथा यह स्वभावदोष दूर करने हेतु क्या प्रयास करने चाहिए ?’, इसका ईश्वर ने मुझसे जो चिंतन करवाया, उसे आगे दिया है ।
इस लेख में हम ‘पूर्वाग्रह होना’, इस स्वभावदोष का स्वरूप, पूर्वाग्रह उत्पन्न होने के कारण, उसके परिणाम तथा उसपर हम कैसे विजय प्राप्त कर सकते हैं ?’, इस विषय में समझ लेते हैं ।
अहंकार का युग कहे जानेवाले कलियुग में साधकों से स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन कर लेनेवाले ‘धर्ममार्तंड सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी’ !
स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया के कारण दोषों पर नियंत्रण पाकर गुणों का विकास होता है । इसलिए जीवन सुखी एवं आदर्श बन जाता है ।
साधक आनंदप्राप्ति हेतु साधना कर रहे हैं । जीवन आनंदमय होने हेतु चित्त पर स्थित जन्म-जन्म के संस्कार नष्ट होने चाहिए तथा उसके लिए स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन की प्रक्रिया गंभीरता से अपनाई जानी चाहिए ।
‘विज्ञान स्थूल सूत्रों पर कार्यरत है, जबकि अध्यात्म सूक्ष्म स्तर पर, अर्थात मन-बुद्धि-चित्त इन चरणों पर कार्य करता है । विज्ञान भी धीरे धीरे सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने लगा है; परंतु उसी समय अध्यात्म उससे भी आगे जाकर सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम स्तर तक कार्य करता है ।
सद्गुरु नीलेश सिंगबाळजी एवं श्री. शंभू गवारे ने क्रमशः ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के कार्य में साधना की आवश्यकता’ तथा ‘हलाल (जो इस्लाम के अनुसार वैध है, वह) अर्थव्यवस्था की भीषणता’ विषयों पर उपस्थित धर्मप्रेमियों को संबोधित किया ।
अब आपातकाल प्रारंभ हो चुका है । तीसरा विश्वयुद्ध अत्यधिक विनाशकारी होनेवाला है । उसके लिए हमें तैयार रहना आवश्यक है । आपातकाल से पार होने के लिए साधना आवश्यक है । उस दृष्टि से शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होने में आनेवाली बाधाएं और उसपर समाधान योजना समझ लेते हैं ।
अष्टांग साधना में स्वभावदोष-निर्मूलन (एवं गुणसंवर्धन), अहं-निर्मूलन, नामजप, भावजागृति, सत्संग, सत्सेवा, त्याग एवं प्रीति यह ८ चरण हैं | यह साधना का क्रम सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने विशद किया है, वह विशेषतापूर्ण है