वैश्‍विक हिन्दू राष्‍ट्र अधिवेशन का पांचवां दिन (२८ जून) – उद़्‍बोधन सत्र : मंदिर संस्‍कृति का पुनर्जीवन

मंदिर के पुरोहितों का धर्म केवल लोगों को तिलक लगाने तक ही मर्यादित नहीं है । हिन्दुओं को धर्म की शिक्षा देना भी उनसे अपेक्षित है । उससे हिन्दुओं का धर्माभिमान बढकर उनका मनोबल बढेगा औेर सभी संगठित होंगे ।

‘हिन्दू नववर्ष कैसे मनाएं ?’, इस विषय पर राजस्थान में हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा प्रबोधन !

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से यहां स्थानीय मंदिर में सामूहिक रूप से ब्रह्मध्वज का रोपण किया गया । प्रार्थना एवं मंत्रों के उच्चारण के साथ में प्रसाद वितरण कर यह कार्यक्रम उत्साहपूर्वक संपन्न हुआ ।

अक्षय तृतीया के अवसर पर उससे संबंधित धार्मिक कृत्य कैसे करें एवं उसका लाभ क्या है ?

हिन्दू धर्म के साढे तीन शुभमुहूर्ताें में से एक है वैशाख शुक्ल तृतीया । इसीलिए इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं । इस तिथि पर कोई भी समय शुभमुहूर्त ही होता है । इस वर्ष अक्षय तृतीया १० मई २०२४ को हैं ।

अक्षय तृतीया के पर्व पर ‘सत्पात्र दान’ देकर ‘अक्षय दान’ का फल प्राप्त करें !

‘अक्षय तृतीया’ हिन्दू धर्म के साढेतीन शुभमुहूर्ताें में से एक मुहूर्त है । इस दिन की कोई भी घटिका शुभमुहूर्त ही होती है । इस दिन किया जानेवाला दान और हवन का क्षय नहीं होता; जिसका अर्थ उनका फल मिलता ही है । इसलिए कई लोग इस दिन बडी मात्रा में दानधर्म करते हैं ।

धर्मप्रेम बढाएं और धर्माभिमानी बनें !

यह न भूलें कि ‘धर्म’ राष्ट्र का प्राण है । राष्ट्र को धर्म का अधिष्ठान हो, राजा तथा प्रजा दोनों धर्मपालक हों, तभी राष्ट्र सभी संकटों से मुक्त और सुखी बनता है !

श्रीराम नवमी एवं हनुमान जयंती के निमित्त उनके विषय में कुछ विशेष जानकारी…

देवताओं एवं अवतारों की जन्मतिथि पर उनका तत्त्व भूतल पर अधिक सक्रिय रहता है । श्रीरामनवमी के दिन रामतत्त्व सामान्य की तुलना में १ सहस्र गुना सक्रिय रहता है ।

नववर्षारंभ के निमित्त सनातन संस्था द्वारा प्रवचन

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही ब्रह्मदेव ने ब्रह्मांड की निर्मिति की । उनके नाम से ही ‘ब्रह्मांड’ नाम प्रचलित हुआ । इसका महत्त्व क्या है तथा इसे कैसे मनाना चाहिए, इसके बारे में सनातन संस्था की ओर से यहां के नक्की घाट स्थित त्रिदेव मंदिर में श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन किया ।

आचारों का पालन करना ही अध्यात्म की नींव है ।

प्राचीन काल में तुलसी जी को जल चढाकर वंदन किया जाता था; परन्तु आज अनेक लोगों के घर तुलसीवृन्दावन भी नहीं होता । प्राचीन काल में सायंकाल दीपक जलाकर ईश्वर के समक्ष स्तोत्र पठन किया जाता था; परन्तु आज सायंकाल बच्चे दूरदर्शन पर कार्यक्रम देखने में मग्न रहते हैं ।

शुभसूचक कृत्य करना अथवा शुभ वस्तुओं की ओर देखना

‘बडों का अभिवादन करना, दर्पण या घी में अपना प्रतिबिम्ब देखना, केशभूषा करना, अलंकार धारण करना, नेत्रों में अंजन या काजल लगाना आदि कृत्य शुभसूचक होते हैं ।’

फेटे का महत्त्व और लाभ

‘उपरने से अथवा धूतवस्त्र से सिर को गोलाकार पद्धति से लपेटना, यह सबसे सरल, सहज एवं सात्त्विक उपचार है । इस लपेटे हुए भागके मध्यमें निर्मित रिक्ति में ब्रह्माण्ड के सात्त्विक स्पन्दन घनीभूत होते हैं ।