श्री राजमातंगी देवी की उपासना का वाणी की दृष्टि से महत्त्व

वाणी : मातंगी ‘वैखरी’ शब्द (वाणी) की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए उन्हें ‘वाक् विलासिनी’ (अपने लेखन अथवा वाणी से दूसरों का ध्यान आकर्षित करने की शक्ति) माना जाता है । देवी के स्वरूप को देखें, तो देवी के हाथ में हमें तोता दिखाई देता है । तोता वाणी का प्रतीक है  ।

वाणी के ४ प्रकार हैं । हम जो बोलते हैं, वह वैखरी वाणी है । वैखरी वाणी के आगे के स्तर हैं – मध्यमा वाणी, पश्यन्ती वाणी एवं परा वाणी !

वैखरी वाणी

वैखरी अर्थात जब हम प्रत्यक्ष मुख से ध्वनि बाहर निकालते हैं, वह वाणी । यह वाणी की सबसे स्थूल और व्यक्त अवस्था है । यह विशुद्धचक्र से संबंधित है ।

मध्यमा वाणी

वाणी का अगला प्रकार है मध्यमा वाणी । यह अनाहतचक्र से संबंधित है । प्रत्यक्ष वाक्य बोलने से पहले हम मन में एक वाक्य बनाते हैं अथवा विचार करते हैं, वही मध्यमा वाणी है ।

पश्यन्ती वाणी

वाणी का अगला स्तर है पश्यन्ती वाणी ! ‘पश्यन्ती’ शब्द ‘पश्य’ धातु से बना है । ‘पश्य’ अर्थात देखना । हमें ज्ञात है कि ऋषि-मुनि और संत द्रष्टा होते हैं । उनमें काल के परे देखने की क्षमता होती है । उनकी वाणी अर्थात पश्यन्ती वाणी । पश्यन्ती वाणी मणिपुरचक्र से संबंधित है । यहां शब्दों का उच्चारण नहीं होता; परंतु जो कुछ बोलना अथवा व्यक्त करना है, उसका एक ‘दर्शन’ होता है ।

परा वाणी

वाणी का सर्वोच्च प्रकार है परा वाणी ! परा वाणी में नामजप अर्थात नाम के साथ अद्वैत ! यहां देवता का नाम और नाम लेनेवाला, ऐसी २ अलग संकल्पनाएं नहीं होतीं, अपितु नाम और नाम लेनेवाला एकरूप ही होते हैं ।

श्री राजमातंगी देवी की उपासना का व्यष्टि स्तर पर महत्त्व और प्रार्थना

माता, आप हमारी वाणी पर विराजमान हों..

हम जैसे सामान्य लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण है वैखरी वाणी ! अर्थात हमारे मुख से जो शब्द बाहर निकलते हैं, वे ! एक-दूसरे से जुडने में अथवा एक-दूसरे से दूर होने में यही शब्द कारण बनते हैं । हमने भी दैनिक जीवन में यह अनुभव किया होगा कि गलत शब्दों के उपयोग अथवा शब्दों का गलत प्रकार से उपयोग करने के कारण अनेक प्रसंग उत्पन्न होते हैं, जो असंतोष अथवा दुःख का कारण बनते हैं । राजमातंगी देवी की उपासना वैखरी वाणी की शुद्धि के लिए महत्त्वपूर्ण है । मातंगीदेवी की उपासना से वाणी में माधुर्य आता है  ।

अतः राजमातंगीदेवी के चरणों में शरण जाकर प्रार्थना करें –

‘हे आदिशक्ति राजमातंगी देवी, हम शरणागत भाव से आपके चरणों में प्रार्थना करते हैं, हे मातः, हम साधकों के विशुद्धचक्र की शुद्धि हो । हमारी वाणी सदैव गुरु-संकीर्तन करने, धर्मप्रसार करने, धर्मकार्य करने तथा दुष्ट विचारों का खंडन करने हेतु उपयोग में आए । हे मातः, आप ही हमारी वाणी पर विराजमान हों । हमारी वैखरी वाणी की शुद्धि हो  ।’ – श्री. चेतन राजहंस (७.५.२०२६)

श्री राजमातंगी देवी की उपासना का समष्टि स्तर पर महत्त्व और प्रार्थना

१७ मई २०२६ को संपन्न हुआ राजमातंगी महायज्ञ केवल व्यक्तिगत उपासना के लिए नहीं, अपितु समष्टि उद्देश्य हेतु किया गया । राजमातंगी देवी वैखरी वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं ।

वर्तमान में समष्टि अथवा विश्व स्तर पर किस प्रकार की घटनाएं घट रही हैं, यह हम देख ही रहे हैं । अमेरिका-ईरान युद्ध के समय हमने समाचार-पत्रों में पढा अथवा समाचार चैनलों में देखा कि महाशक्ति माने जानेवाले अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प ईरान को अनेक चेतावनियां दे रहे थे । दूसरी ओर ईरान भी अमेरिका को प्रत्युत्तर दे रहा था । हॉर्मुज जलडमरूमध्य (दो समुद्रों को जोडनेवाला भूभाग) बंद होने से तेल आपूर्ति पर बडा प्रभाव पडा । इस संपूर्ण युद्धजन्य परिस्थिति में आग में घी डालने का कार्य यदि किसी ने किया, तो वह शब्दों ने ! भारत इस युद्ध में सहभागी नहीं था, तब भी उसकी आंच भारत को भी सहनी पडी; परंतु भारत ने अन्य देशों के साथ उच्चस्तरीय बैठकें आयोजित कर भारतहित सुरक्षित रखने का प्रयास किया । इस संपूर्ण रणनीति में भी पुनः महत्त्वपूर्ण हैं – शब्द ।

अत: हम राजमातंगी देवी के चरणों में प्रार्थना करेंगे –

‘हे जगज्जननी राजमातंगी देवी, इस पवित्रतम भारतभूमि की रक्षा हेतु वाक्युद्ध लडनेवाले जो देशप्रेमी भारतीय हैं, उन पर आपकी कृपादृष्टि बनी रहे । इस तपोभूमि भारत के चारों ओर आपका सुरक्षा-कवच बना रहे । हे भगवती, धर्म और राष्ट्र के विरोध में बोलनेवालों का वैचारिक तथा शाब्दिक खंडन करने हेतु आप ही हमें शक्ति प्रदान करें । सनातन धर्म और सनातन भारत का गुणगौरव करने का सौभाग्य हमारी वाणी को प्राप्त हो’, ऐसी हम आपके चरणों में शरणागत भाव से प्रार्थना करते हैं !’ – श्री. चेतन धनंजय राजहंस (७.५.२०२६)