
प्रश्न : अनिष्ट शक्तियों के कारण साधकों को होनेवाले कष्टों के संदर्भ में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के आध्यात्मिक उपचारों के अगले स्तर ध्यान में आए हैं । उनके पीछे का अध्यात्मशास्त्र चाहिए, साथ ही यदि कुछ और स्तर हों, तो वे भी योग्य स्थान पर चाहिए ।
१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा व्यष्टि स्तर पर साधकों के लिए किए गए आध्यात्मिक उपचारोंके प्रकार
अ. साधकों के लिए स्वयं उपचार करना
आ. साधकों को उपयुक्त उपचार बताना
इ. साधकों पर पंचतत्त्वों के उपचार होने के लिए उन्हें इत्र जैसी वस्तुएं उपयोग करने के लिए कहना अथवा उपयोग के लिए संतों के हस्तलेख समान कुछ वस्तुएं देना
ई. साधकों द्वारा कष्ट बताने पर उन साधकों का कष्ट अपनेआप कम होना
२. समष्टि स्तर के उपचार : सभी को सामूहिक नामजप इ. उपचार बताना
३. काल के स्तर के उपचार
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा साधक को उसके कष्ट पर कोई भी उपचार न बताते हुए ‘कुछ घंटों में कष्ट कम हो जाएगा’, ऐसा बताना और उसी प्रकार उनका कष्ट कम होना
४. कालातीत स्तर के उपचार
क्या ऐसा कुछ है ?
श्री. राम होनप द्वारा दिया गया उत्तर :
१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा व्यष्टि स्तर पर साधकों के लिए किए गए उपचारों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार

१ अ. साधकों के लिए स्वयं उपचार करना : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने कुछ आध्यात्मिक कष्टवाले साधकों के लिए स्वयं नामजप आदि उपचार किए हैं । उसके कारण आगे दिए गए हैं ।
१ अ १. भक्तवत्सल अवस्था : साधक में आध्यात्मिक उन्नति की लगन होती है; परंतु अनिष्ट शक्तियों के सूक्ष्म से हुए आक्रमणों के कारण, उस साधक को साधना करते समय असंख्य कठिनाइयां आती हैं । तब सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी उस साधक की तत्परता से सहायता करते हैं । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी की यह ‘भक्तवत्सल’ अवस्था है । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा उस साधक के लिए नामजप आदि उपचार करने के कारण उसका कष्ट अल्प समय में कम हो जाता है । परिणामस्वरूप उस साधक के लिए साधना करना सुलभ हो जाता है ।
१ अ २. प्रीतिमय अवस्था : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी का साधना करनेवाले साधकों पर निरपेक्ष प्रेम है । इसलिए वे साधक के आध्यात्मिक कष्ट दूर करने के लिए प्रयासरत रहते हैं । यह सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी की साधकों पर ‘प्रीतिमय अवस्था’ है ।
१ अ ३. प्रारब्धानुसार उपचार : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा साधक के लिए नामजप आदि उपचार करते समय उस साधक की साधना की ‘लगन’ और ‘भाव’ ये घटक महत्वपूर्ण होते हैं, साथ ही उस समय साधक का ‘प्रारब्ध’ यह घटक भी महत्त्वपूर्ण होता है । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा किए गए नामजप आदि उपचारों की परिणामकारकता उस साधक के प्रारब्ध पर भी निर्भर करती है । इसलिए इन उपचारों को ‘प्रारब्धानुसार उपचार’, ऐसा कहा गया है । उस ‘साधक की साधना और उसका प्रारब्ध’, इसके अनुसार उसका जितना कष्ट कम होना होता है, उतना कम हो जाता है । कुछ प्रसंगों में साधक का तीव्र प्रारब्ध होता है, तब गुरुकृपा के कारण उसका कष्ट कम हो जाता है ।
१ आ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा साधकों को व्यक्तिगत रूप से उपयुक्त उपचार बताना : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी कुछ प्रसंगों में साधक के आध्यात्मिक कष्ट पर प्रत्यक्ष नामजप आदि उपचार न कर उस साधक को ‘विशिष्ट नामजप, न्यास और मुद्रा ढूंढकर देना, प.पू. भक्तराज महाराजजी की चैतन्यमय वाणी के भजन सुनने के लिए कहना, खाली डिब्बों (खोकों) द्वारा आकाशतत्त्व के उपचार करने के लिए कहना, साधक को सोने से पहले स्वयं के चारों ओर सनातन-निर्मित नामजप-पट्टियों का मंडल बनाने के लिए कहना’ इत्यादि उपचार बताते हैं । उसे ‘नैमित्तिक उपचार’ कहते हैं । साधक का विशिष्ट कष्ट कम होने के लिए, विशिष्ट उपचार विशिष्ट समय के लिए बताना, इसे ‘नैमित्तिक उपचार’ कहते हैं ।
१ आ १. नैमित्तिक उपचारों का महत्त्व
१ आ १ अ. प्रारब्ध का वेग कम होना : जब साधक का उसके पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों का दोष उभरकर आता है, तब उसे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पीडा हो रही होती है । ऐसे समय में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी उस साधक को ‘वह पीडा सहन हो सके और उसका वह दोष शीघ्र दूर होकर उसकी साधना अच्छी हो’, इसके लिए विशिष्ट उपचार बताते हैं । इससे साधक के प्रारब्ध का वेग अल्प समय में कम होने में सहायता मिलती है ।
१ आ १ आ. अनिष्ट शक्तियों का बल कम होना : कुछ साधकों की योग्य प्रकार से साधना हो रही होती है । तब अनिष्ट शक्तियां चिढकर उन साधकों पर सूक्ष्म से आक्रमण करती हैं । इससे उन साधकों के कष्टों में अचानक वृद्धि होती है । उस पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा बताए गए विशिष्ट उपचारों के कारण उन साधकों को कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्तियों का बल कम हो जाता है । परिणामस्वरूप उन साधकों का कष्ट अल्प समय में कम हो जाता है ।
१ इ. कष्ट से पीडित साधक स्वयं उपचार करने में सक्षम न होने से उसे इत्र जैसी वस्तुएं अथवा व्यक्तिगत रूप से उपयोग के लिए संतों के हस्तलेख जैसी कुछ वस्तुएं देने से उसका कष्ट दूर होना : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को कभी-कभी साधक को आध्यात्मिक कष्ट होने पर, उसके लिए नामजप आदि उपचार करने की प्रेरणा नहीं होती, साथ ही उस समय वह साधक स्वयं कुछ उपचार करने में सक्षम नहीं होता । तब सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी उस साधक को ‘सनातन-निर्मित इत्र अथवा कर्पूर लगाने के लिए कहते हैं अथवा संतों का हस्तलेख उपचार के लिए देते हैं । उसे ‘वस्तु निर्देश’ कहते हैं । ‘वस्तु’ का अर्थ ‘सात्त्विक वस्तु’ और ‘निर्देश’ का अर्थ ‘सूचित करना’ होता है । संतों द्वारा साधक को सात्त्विक वस्तु उपचारों के लिए उपयोग करने के विषय में बताना, इसे ‘वस्तु निर्देश करना’ कहते हैं ।
१ इ १. उपचारों के लिए इत्र और कर्पूर का उपयोग करने से अनिष्ट शक्ति द्वारा फैलाई गई दुर्गंध कम होना : साधक को कष्ट देनेवाली कुछ अनिष्ट शक्तियों की काली शक्ति दुर्गंधयुक्त होती है । ऐसे साधक द्वारा ‘इत्र और कर्पूर की सुगंध लेना, इत्र शरीर पर लगाना अथवा कर्पूर का चूर्ण शरीर पर लगाना’, ऐसे आध्यात्मिक उपचार करने पर उस अनिष्ट शक्ति की दुर्गंध तुरंत कम हो जाती है । इससे उस अनिष्ट शक्ति का बल तुरंत कम हो जाता है ।
१ इ २. संतों का हस्तलेख पास रखने से अनिष्ट शक्तियों द्वारा साधक के अनाहत चक्र के पास काले बादलों की भांति एकत्रित की गई कष्टदायक शक्ति कम होने लगना : अनिष्ट शक्ति के सूक्ष्म से आक्रमणों के कारण साधक के अनाहत चक्र के पास काले बादलों के आकार की भांति कष्टदायक शक्ति एकत्रित होती है । इससे साधक को मुख्य रूप से मानसिक स्वरूप के कष्ट तीव्रता से होते हैं । इस कारण उसे तनाव (दबाव) अनुभव होता है; परंतु जब वह साधक संतों का हस्तलेख अपने पास रखता है, तब उस लेखन के चैतन्य के कारण साधक में व्याप्त कष्टदायक शक्ति कम होने लगती है । इससे साधक के मन का तनाव अचानक कम होने लगता है ।
१ ई. साधकों द्वारा अपने कष्ट सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को बताने पर उन साधकों के कष्ट अपनेआप कम होना : जब कोई साधक स्वयं को होनेवाले कष्ट सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को बताता है, तब उसकी लगन और गुरु के प्रति भाव सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी तक पहुंचता है । उस समय साधक पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी की कृपादृष्टि पडती है । इससे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी की देह का चैतन्य उस साधक की दिशा में प्रक्षेपित होता है । उस चैतन्य के कारण उस साधक के कष्ट कम होने लगते हैं । इसे गुरु की साधक पर ‘अमृतदृष्टि’ भी कहते हैं ।
२. समष्टि स्तर पर उपचार बताने के कारण
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी कभी-कभी सभी स्थानों के साधकों को सामूहिक नामजप आदि उपचार बताते हैं । उसके कारण आगे दिए गए हैं ।
२ अ. काल की प्रतिकूलता : काल की प्रतिकूलता होने के कारण साधकों को ‘साधना करने अथवा अध्यात्मप्रसार का कार्य करने’ में अनेक बाधाएं उत्पन्न होती हैं ।
२ आ. अनिष्ट शक्तियों के सूक्ष्म के आक्रमणों का स्वरूप : सप्तपाताल की कुछ बडी अनिष्ट शक्तियों का सभी साधकों पर एकत्रित होकर सूक्ष्म से आक्रमण करने का नियोजन होता है ।
२ इ. साधकों को होनेवाले कष्टों का स्वरूप : सप्तपाताल की कुछ बडी अनिष्ट शक्तियों को प्रतिकूल काल का साथ मिल रहा होता है । इसलिए उस काल में सभी साधकों के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों में बहुत वृद्धि होने की संभावना होती है । इसका सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को अंतर्ज्ञान होता है । तब वे साधकों को ‘कुछ समय अनिष्ट शक्तियों से साधकों की रक्षा हो’, इसके लिए विशिष्ट काल में विशिष्ट जप करने के लिए कहते हैं । इससे साधकों की रक्षा होकर उनकी साधना और धर्मकार्य सुचारू रूप से चलता रहता है ।
३. काल के स्तर पर उपचार के पीछे का शास्त्र
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी साधकों को कभी-कभी कोई भी उपचार न बताते हुए उन्हें ‘कुछ घंटों में कष्ट कम हो जाएगा’, ऐसा बताते हैं और उसी प्रकार उस साधक का कष्ट कम हो जाता है । उसका कारण आगे दिया गया है ।
३ अ. ‘प्रतिकूल काल और प्रतिकूल प्रारब्ध’, इनके कारण साधक द्वारा कुछ समय कष्ट भोगना अपरिहार्य होना : साधक के लिए कुछ समय साधना के लिए प्रतिकूल होता है, तब उसका प्रारब्ध प्रतिकूल होता है । ऐसे प्रसंग में साधक को कोई भी उपचार लागू नहीं होता । उसके द्वारा उतना समय कष्ट सहन करना, बस इतना ही उसके हाथ में होता है । उस साधक के विषय में सूक्ष्म गणित सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को अंतर्ज्ञान से समझ आता है । तब वे साधक को बताते हैं, ‘कुछ घंटों में कष्ट कम हो जाएगा’। वह प्रतिकूल काल और प्रारब्ध भोगने का समय समाप्त होते ही, उस साधक का कष्ट अपनेआप कम हो जाता है । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी उस साधक को कष्ट की अवधि में कष्ट सहन करने की शक्ति देते हैं । ऐसे प्रसंग में साधक के लिए ‘विशिष्ट काल का समाप्त होना’, यही उपचार होता है ।
४. कालातीत स्तर पर उपचार
जब साधक निरंतर आत्मानंद अथवा ईश्वरीय आनंद में होता है, तभी वह कालातीत हो सकता है । भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल में सतत आनंदित रहनेवाले जीव को ‘कालातीत अवस्था’ प्राप्त होती है । उसे काल का कोई भी बंधन नहीं रहता । साधक के लिए कालातीत स्तर के उपचार आगे दिए गए हैं ।
४ अ. अखंड नामसाधना करना : कष्टवाले साधक को भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल के परे जाने के लिए ‘अखंड नामजप करना’, यह कालातीत उपचार है । ‘साधक का नामजप न हो’, इसके लिए अनिष्ट शक्तियां हर संभव प्रयास करती हैं; परंतु साधक द्वारा गुरु पर श्रद्धा रखकर निरंतर निश्चय से नामजप करने पर ‘प्रतिकूल काल और प्रतिकूल प्रारब्ध’ का उस साधक पर होनेवाला परिणाम कम होने लगता है । आगे अखंड नामजप से साधक को कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्तियों का बल कम होकर कालांतर में साधक का कष्ट समाप्त हो जाता है । ऐसा साधक कालातीत होता है ।
४ आ. गुरुकृपायोग के अनुसार निरंतर साधना करना : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा प्रतिपादित गुरुकृपायोग के अनुसार निरंतर साधना करने से साधक के तन और मन की शुद्धि होने लगती है । ऐसे साधक पर गुरु की कृपा होती है । गुरुकृपायोग सत्य, शाश्वत है और चिरंतन आनंद देनेवाला है । साधक द्वारा मनोभाव से सतत गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करने पर उसका प्रतिकूल प्रारब्ध दूर होता है । ऐसे साधक पर किसी भी प्रतिकूलता का प्रभाव नहीं होता । ‘गुरुकृपायोग के अनुसार निरंतर साधना करना’, यह साधकों के लिए कालातीत उपचार है ।
– श्री. राम होनप (सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधक), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (ज्ञान मिलने का दिनांक : २६.१.२०२६, समय : सवेरे १०.२०, अवधि : ३० सेकेंड)
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