‘यज्ञ आध्यात्मिक बल प्राप्त करने का सुलभ माध्यम है । उसके कारण ही प्राचीन काल से ‘यज्ञ करना’ वांछित फलप्राप्ति एवं आपत्ति निवारण का सुलभ मार्ग है । अत: यज्ञ का बडा महत्त्व है । आनेवाला आपातकाल एवं तृतीय विश्वयुद्ध का सामना करने हेतु शारीरिक एवं मानसिक बल प्राप्त करने के विभिन्न मार्ग उपलब्ध हो सकते हैं; परंतु आध्यात्मिक बल तो केवल साधना एवं यज्ञ के द्वारा ही उत्पन्न हो सकता है । आवश्यक उतनी तीव्रता से साधना करना सभी को संभव नहीं होता । ऐसी स्थिति में यज्ञ करना सबसे सुलभ एवं सभी के लिए पूरक मार्ग है । वातावरण पर यज्ञ का बहुत तीव्र गति से एवं अधिक मात्रा में सकारात्मक परिणाम होता है, यह बात विभिन्न वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है । अतः हिन्दुओ, आगामी तृतीय विश्वयुद्ध के दुष्परिणाम टालने हेतु तथा उसके आगे रामराज्य की स्थापना हेतु यज्ञसंस्कृति का पुनरुत्थान करें !’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवले

(और इनकी सुनिए…) ‘कुंकुम इस्लामी देशों से आता है, तो क्या फिर हिन्दु तिलक लगाना बंद कर देंगे ?’ – Priyank Kharge
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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