आध्यात्मिक उपचारों के संदर्भ में यह ध्यान रखें !

पू . संदीप आळशी

१. आध्यात्मिक उपचार के रूप में नामजप करनेवाले साधक आरंभ में प्राणशक्ति प्रणाली के अनुसार ढूंढा हुआ नामजप कर उसके उपरांत रामनाम का नामजप करें

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी ने काल के अनुसार साधना के रूप में दिन में न्यूनतम १० मालाएं श्रीराम का नामजप करने के लिए कहा है । यह नामजप प्रमुखता से ‘आपातकाल से रक्षा हो एवं रामराज्य की स्थापना हो’, इस उद्देश्य से बताया गया है ।

आध्यात्मिक कष्ट से पीडित साधकों के लिए नामजप करते समय आरंभ में ‘प्राणशक्ति प्रणाली’ के अनुसार नामजप ढूंढकर उसे करना तथा उसके उपरांत श्रीराम का नामजप करना अधिक उचित है । इसका कारण यह है कि हमें पंचतत्त्व (पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश) अथवा निर्गुण में से जिस तत्त्व से संबंधित कष्ट होता है, उस तत्त्व का नामजप ढूंढकर उसे करने से वह कष्ट शीघ्र दूर होता है । इसके उपरांत रामनाम का जप करने से काल के अनुसार आवश्यक रामतत्त्व अधिक मात्रा में ग्रहण हो सकता है ।

२. आध्यात्मिक उपचार करते समय आवरण निकालना एवं न्यास करना स्थूल से संभव न हो, तो उसे सूक्ष्म से करें !

‘आध्यात्मिक उपचार करते समय पहले स्वयं के देह पर स्थित आवरण निकालना, साथ ही नामजप करते समय उसमें यदि न्यास हो, तो वह करना महत्त्वपूर्ण होता है; क्योंकि इससे उपचार और अधिक प्रभावकारी होते हैं । कभी-कभी व्यक्ति को अति थकान होने के कारण अथवा हाथ में पीडा होने के कारण आवरण निकालना अथवा न्यास करना संभव नहीं होता । यात्रा करते समय अथवा किसी कार्यालय जाने पर वहां नामजप करते समय आवरण निकालना एवं न्यास करना अधिकांशतः संभव नहीं होता । ऐसी स्थिति में सूक्ष्म से आवरण निकालें एवं न्यास करें । इन दोनों क्रियाओं को सूक्ष्म से करना अर्थात इन क्रियाओं को हम जैसे स्थूल से करते हैं उसी प्रकार; परंतु मन लगाकर करना !’ इन क्रियाओं को स्थूल से करने से जितना लाभ मिलता है, लगभग उतना ही लाभ इन क्रियाओं को सूक्ष्म से करने से भी होता है । ’, ऐसा मैंने अनेक बार अनुभव किया है ।’

– (पू.) संदीप आळशी (२४.५.२०२६)

  • आध्यात्मिक कष्ट : इसका अर्थ है व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन होना । मंद आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन ३० प्रतिशत से अल्प होना । मध्यम आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है नकारात्मक स्पंदन ३० से ४९ प्रतिशत होना; और तीव्र आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है नकारात्मक स्पंदन ५० प्रतिशत अथवा उससे अधिक मात्रा में होना । आध्यात्मिक कष्ट प्रारब्ध, पितृदोष इत्यादि आध्यात्मिक स्तर के कारणों से होता है । किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक कष्ट को संत अथवा सूक्ष्म स्पंदन समझनेवाले साधक पहचान सकते हैं ।
  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।
  • इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक