राजमातंगी देवी की उपासना का कला की दृष्टि से महत्त्व

श्री राजमातंगी देवी
चेतन राजहंस

१४ विद्याओं और ६४ कलाओं का उद्गम स्थान है भारत ! आकाश में अनंत तारे हैं । रात्रि के समय यदि हम स्वच्छ आकाश को देखें, तो अनेक नक्षत्र और तारे दिखाई देंगे । ये तारे और नक्षत्र संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशमान करते हैं । उसी प्रकार संपूर्ण सृष्टि को ज्ञान-विज्ञान के माध्यम से यदि कोई प्रकाशमान करता है, तो वह है वैदिक ज्ञानपरंपरा । १४ विद्याओं और ६४ कलाओं का उद्गम भारत में हुआ । भगवान श्रीकृष्ण १४ विद्याओं और ६४ कलाओं में निपुण थे । इसलिए उन्हें ‘पूर्णपुरुषोत्तम’ भी कहा जाता है । ये विद्याएं और कलाएं प्रसिद्धि अथवा मनोरंजन के लिए नहीं थीं, अपितु उनका अंतिम उद्देश्य था ‘मोक्षप्राप्ति’ ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की प्रेरणा से महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय कार्यरत है, जिसके माध्यम से कला के द्वारा ईश्वरप्राप्ति कैसे करनी है, इसकी ‘प्रैक्टिकल’ (प्रत्यक्ष) शिक्षा भी दी जाती है । शुद्ध और सात्त्विक कला के प्रस्तुतीकरण से आनंद प्रवाहित होता है; परंतु आजकल अनेक कलाओं को व्यावसायिक स्वरूप प्राप्त हो गया है । उनमें विकृति प्रवेश कर गई है । ऐसे समय विद्याओं और कलाओं का मूल सात्त्विक स्वरूप बना रहे तथा उन्हें आत्मसात करने की प्रेरणा जनमानस में उत्पन्न हो; इसलिए कलाओं की अधिष्ठात्री श्री राजमातंगी देवी का कृपाशीर्वाद आवश्यक है ।

इसके लिए श्री राजमातंगी देवी के चरणों में आर्त्तता से प्रार्थना करें -‘हे समस्त विद्याओं और कलाओं की जननी, विद्याओं और कलाओं का शुद्ध स्वरूप बना रहे । विद्याओं का अध्ययन करनेवाले तथा कला की साधना करनेवाले उपासकों पर आपकी कृपादृष्टि बनी रहे । सनातन संस्कृति पर आया आवरण दूर हो । सनातन संस्कृति का तेज प्रकट हो’, ऐसी हम आपके चरणों में शरणागत भाव से प्रार्थना करते हैं ।’

– श्री. चेतन धनंजय राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था. (७.५.२०२६)