प.पू. भक्तराज महाराजजी के पावन सान्निध्य की कुछ हृदयस्पर्शी स्मृतियां !

प.पू. भक्तराज महाराजजी

१. प.पू. भक्तराज महाराजजी (प.पू. बाबा) द्वारा लिखित तथा ढूंढकर भी किसी को न मिलनेवाला ग्रंथ प.पू. बाबा द्वारा आश्रम से ढूंढकर लाया जाना 

डॉ. दुर्गेश सामंत

१ अ. प.पू. बाबा द्वारा लिखित मिरज के एक संत प.पू. ग्यानगिरी महाराजजी का जीवनचरित्र पढने की इच्छा होना; परंतु सांगली एवं मिरज में प्रत्यक्ष जाकर वहां ढूंढने पर भी ग्रंथ न मिलना : ‘आरंभिक काल में किसी ने मुझे बताया कि प.पू. बाबा ने मिरज के एक संत प.पू. ग्यानगिरी महाराजजी का जीवनचरित्र लिखा है । तब वह पढने की मुझे इच्छा हुई । एक दिन हमने वह ग्रंथ दोपहर से रात तक सांगली एवं मिरज में जाकर ढूंढा; परंतु तब भी वह ग्रंथ हमें नहीं मिला ।

१ आ. मिरज के प.पू. ग्यानगिरी महाराजजी के मठ में जाने पर वहां के एक संन्यासी द्वारा उसके पास की उस ग्रंथ की प्रति दिखाना; परंतु उनके द्वारा उनके पास उस ग्रंथ की एक ही प्रति होने से उसे देने में असमर्थता दर्शाना : उसके उपरांत हम उस ग्रंथ को ढूंढने के लिए मिरज के प.पू. ग्यानगिरी महाराजजी के मठ पहुंचे । वहां हमें एक युवक मिला । हमने जब उसे उस पुस्तक के विषय में पूछा, तब उसने कहा, ‘‘इस मठ के एक संन्यासी इसी गली में रहते हैं । वे वृद्ध हैं । उन्हें कदाचित ज्ञात होगा ।’’ हमने उस संन्यासी के घर जाकर उन्हें उस पुस्तक के विषय में पूछा, तो उन्होंने बताया, ‘‘ऐसी पुस्तक है । मैंने पढी है; परंतु अब वह पुस्तक बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है तथा वह किसके पास है, यह मुझे ज्ञात नहीं । मेरे पास उस पुस्तक की एक जेरॉक्स प्रति है ।’’ वे घर की पडछत्ती पर जाकर वह जेरॉक्स प्रति लेकर आए । उसे देखकर मैंने उनसे पूछा, ‘‘क्या आप दो दिन के लिए यह पुस्तक मुझे देंगे ?’’ हम उनके लिए अपरिचित होने से उन्होंने कहा, ‘‘न्यास के पास अब यही एक प्रति शेष है । इसे मैं आपको नहीं दे सकता ।’’

१ इ. प.पू. बाबा द्वारा एक भक्त को भक्तवात्सल्य आश्रम में रखी गई पुस्तक लाने के लिए कहने पर भक्त को वह पुस्तक न मिलना; परंतु प.पू. बाबा द्वारा बताए गए स्थान पर वह पुस्तक मिलना : कुछ दिन पश्चात मैंने प.पू. बाबा को दूरभाष कर उस पुस्तक के विषय में पूछा । आगे जाकर कुछ सप्ताह पश्चात प.पू. बाबा ईश्वरपुर आ गए । जब हम उनके दर्शन करने गए, तब उन्होंने एक भक्त से कहा, ‘‘डॉक्टर के लिए जो पुस्तक लाए हैं, वह उन्हें लाकर दे दो ।’’ उस भक्त को वह पुस्तक नहीं मिली, तब प.पू. बाबा ने ही बताया कि गाडी में वह पुस्तक कहां रखी है । उस भक्त ने मुझे वह पुस्तक लाकर दी तथा कहा, ‘‘हमने कभी यह पुस्तक देखी भी नहीं थी । वह केवल प.पू. बाबा को ही ज्ञात था । आपका दूरभाष आने के उपरांत हमने भक्तवात्सल्य आश्रम में यह पुस्तक बहुत ढूंढी । अंततः प.पू. बाबा ने ही हमें बताया कि ‘वह पुस्तक कहां है’ तथा वहीं हमें यह पुस्तक मिली । आश्रम में इस पुस्तक की एक ही प्रति थी ।’’ मुझे बहुत आश्चर्य हुआ । वह पुस्तक अच्छी स्थिति में थी तथा पुस्तक के सभी पृष्ठ व्यवस्थित थे ।

आगे जाकर हमने वह पुस्तक सनातन संस्था के संग्रह में जमा की । इसकी एक रोचक बात यह कि इस पुस्तक में लेखक के रूप में ‘प.पू. भक्तराज महाराजजी’ छपा होने पर भी उसमें अधिकांश लेखन प.पू. झुरळे महाराजजी ने ही किया है ।’ ऐसा मुझे प.पू. डॉक्टरजी से ज्ञात हुआ । उसमें प.पू. झुरळे महाराजजी का मनोगत है; परंतु लेखक के रूप में प.पू. बाबा का नाम है ।

२.  २५ दिन तक व्यवसाय बंद कर प.पू. बाबा के अमृत महोत्सव में जाकर आने पर अधिकोष के एक कर्मचारी को इंदौर न जाकर भी ‘प.पू. बाबा पर उसकी श्रद्धा मुझसे अधिक है’, यह ध्यान में आना

हम लगभग २५ दिन हमारा व्यवसाय बंद कर प.पू. बाबा के अमृत महोत्सव के लिए इंदौर गए । इंदौर से वापस आने पर जब मैं किसी काम से अधिकोष गया, तब वहां के एक कर्मचारी ने मुझसे पूछा, ‘‘आप इतने दिनों से दिखाई नहीं दिए ?’’ इतने वर्षाें में मेरी उससे कोई बात नहीं हुई थी । वह अन्य लोगों से भी आवश्यक उतना ही बोलता था । मैंने कहा, ‘‘इंदौर में हमारे गुरुदेवजी का अमृत महोत्सव था, मैं वहां गया था ।’’ उसने पूछा, ‘‘कौन हैं आपके गुरु ?’’ मैंने उसे बताया, ‘प.पू. भक्तराज महाराजजी’ । ‘प.पू. भक्तराज महाराजजी’ नाम सुनते ही वह कर्मचारी हाथ में पकडी हुई लेखनी नीचे रखकर खडा हो गया तथा हाथ जोडकर कहने लगा, ‘‘भक्तराज महाराजजी तो साक्षात दत्तत्रेयजी के अवतार हैं !’’ मैं आश्चर्यचकित रह गया । उस समय ‘मैं कितना श्रेष्ठ हूं; क्योंकि मैं प.पू. बाबा के उत्सव के लिए २५ दिन सबकुछ छोडकर गया ।’ यह विचार मेरा अहंकार है’, इसका मुझे तीव्रता से भान हुआ । ‘यह व्यक्ति भले ही इंदौर न गया हो, तब भी ‘प.पू. बाबा पर उसकी श्रद्धा मुझसे कहीं अधिक है’, यह बात मेरे ध्यान में आई । उसके उपरांत मैंने उन्हें अमृत महोत्सव का प्रसाद दिया ।

३. ‘सर्वस्व अर्पित कर दूं’, यह विचार मन में आते ही प.पू. बाबा द्वारा स्वयं के मुंह में डाल रहे पेढे का आधा टुकडा प्रसाद के रूप में देना ! 

प.पू. बाबा ईश्वरपुर के उनके एक भक्त की लडकी की मंगनी के लिए आए थे । हमें भी उस कार्यक्रम में बुलाया गया था । प.पू. बाबा के २ – ३ भक्तों को छोड दें, तो अन्य भक्तों छोडकर, मेरा अन्य किसी भक्त से परिचय नहीं था । मंगनी का यह कार्यक्रम एक विवाह कार्यालय में था । हमारे कार्यक्रम स्थल पहुंचने के उपरांत दोपहर ४ बजे प.पू. बाबा का आगमन हुआ । उन्हें बैठने के लिए सभागृह के मध्य भाग में एक कुर्सी रखी गई थी । मैंने उन्हें नमस्कार किया तथा मैं दूर जाकर खडा रहा । उस समय मेरी दृष्टि प.पू. बाबा के चेहरे से हट नहीं रही थी । उतने में मेरा एक मित्र भी वहां आ गया । वहां उसके भी कोई परिचित न होने से वह मेरे पास आकर मुझसे बातें करने लगा । इससे मेरा ध्यान बंटने लगा । इसलिए मुझे उससे बातें करने की अथवा उसकी ओर देखने की इच्छा नहीं हो रही थी । मेरे मन में उस समय प.पू. बाबा के ही विचार चल रहे थे । कोई प.पू. बाबा के चरणों पर मस्तक रख रहा था, तो कोई उनके साथ बात कर रहा था । मेरे मन में विचार आया, ‘मैं प.पू. बाबा को क्या अर्पित कर सकता हूं ?’ तब विचार आया, ‘मेरी जेब में जो पैसे थे, उन्हें तथा मेरी उंगली में जो अंगूठी थी, वह भी उनके चरणों में रख दूं ।’ उसके पश्चात ऐसा लगा, ‘यह तो केवल धन अर्पित करना हुआ । उसका अर्थ ‘मैंने सबकुछ अर्पण किया’, ऐसा थोडे ही होता है ? उस समय मन में विचार आया, ‘मन कैसे अर्पण करना चाहिए ?’, यह मुझे ज्ञात नहीं है’ । उसी समय प.पू. बाबा के पास से एक भक्त दौडते हुए मेरे पास आए तथा कहने लगे, ‘‘प.पू. बाबा आपको बुला रहे हैं ।’’ मैं उनके पास गया तथा नमस्कार कर प.पू. बाबा के सामने बैठ गया । इतने में श्रीमती नंदिनी भी वहां आई । वह थोडे अंतर पर बैठ गई । उस समय प.पू. बाबा के हाथ में एक पेढा था, जिसे वे खाने ही वाले थे । तब उन्होंने सहज ही पेढे का एक टुकडा अपने मुंह में डाला तथा शेष बचा हुआ टुकडा मेरे हाथ में देकर वे कहने लगे, ‘‘यह तुम ले लो !’’ ‘उसका आधा भाग श्रीमती नंदिनी को (पत्नी को) दूं’, ऐसा मुझे लगा; परंतु उन्होंने तो ‘यह तुम ले लो’, ऐसा बोला था; इसलिए मैंने वह प्रसाद ग्रहण किया । उसके उपरांत प.पू. बाबा और कुछ नहीं बोले । वे अन्यों से बातें कर रहे थे । उसी को उनकी आज्ञा मानकर हम घर आ गए ।’

– डॉ. दुर्गेश सामंत (आयु ६४ वर्ष), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (१०.१२.२०२४)

इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक