नैतिक शिक्षा पर कोई प्रतिबंध नहीं है !

रायपुर (छत्तीसगढ) – विद्यालयों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरुमंत्र तथा अन्य हिन्दू प्रार्थनाओं का पाठ कराने संबंधी राज्य सरकार के परिपत्र को चुनौती देनेवाली याचिका को छत्तीसगढ उच्च न्यायालय ने कुछ दिन पूर्व ही निरस्त कर दिया । न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने याचिका को समयपूर्व (प्रीमैच्योर) बताते हुए निरस्त कर दिया । न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता यह सिद्ध नहीं कर सके कि किसी भी मौलिक अधिकार का वास्तविक उल्लंघन हुआ है अथवा विद्यार्थियों को इन निर्धारित प्रार्थनाओं में भाग लेने के लिए बाध्य किया गया है । यह याचिका छत्तीसगढ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबडा तथा बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद ने विद्यालयी शिक्षा विभाग के इस परिपत्र की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए प्रविष्ट की थी ।
१. न्यायालय ने कहा कि शिक्षा विभाग के आदेश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे विद्यार्थियों के संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक स्वतंत्रता या अंतरात्मा की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हो अथवा उन्हें किसी गतिविधि में अनिवार्य रूप से भाग लेने के लिए बाध्य किया गया हो ।
२. न्यायालय ने आगे कहा कि यह परिपत्र संविधान के अनुच्छेद २८(१) का उल्लंघन नहीं करता । इस अनुच्छेद के अनुसार पूर्णतः सरकारी निधि से संचालित शैक्षिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध है । न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान के अंतर्गत नैतिक शिक्षा पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है ।
३. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद २८(१) ऐसे नैतिक शिक्षण पर रोक नहीं लगाता, जो किसी संप्रदाय विशेष के सिद्धांतों से पृथक हो । ऐसा नैतिक शिक्षण अच्छे नागरिकों का निर्माण करने, कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने तथा सामाजिक समरसता तथा एकता को बढावा देने के लिए आवश्यक माना जाता है ।
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