अपनी सहज बातचीत एवं सरल व्यवहार से भक्तों को सिखानेवाले प.पू. भक्तराज महाराजजी !

७ जुलाई २०२६ को प.पू. भक्तराज महाराजजी का जन्मोत्सव है, इस निमित्त...

सनातन के श्रद्धास्रोत प.पू. भक्तराज महाराजजी

१. प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा भक्त को अहं का त्याग करने के लिए सिखाना

‘एक बार मैंने प.पू. भक्तराज महाराजजी (प.पू. बाबा) के आश्रम में एक थैली (२५ किलो वजन की बोरी) चावल भेजा । उस समय मैं साधना में नया था । मुझे लगा कि मैंने कोई बडा काम किया है । मैंने उस थैली पर किसी का नाम नहीं लिखा था । उसके उपरांत मैं जब प.पू. बाबा के कक्ष में उन्हें नमस्कार करने के लिए गया, उस समय प.पू. बाबा एक भक्त से कहने लगे, ‘‘अरे, किसी ने चावल की एक थैली भेजी है; परंतु उसे क्या पता कि यहां चावल की एक थैली से क्या होगा !’’ इससे मैं समझ गया कि यदि मेरे मन में ‘मैंने कोई बडा काम किया है’, यह विचार न आया होता, तो प.पू. बाबा मुझे यह नहीं सुनाते । इससे उन्होंने मुझे सिखाया कि ‘अहं का त्याग करना चाहिए’ ।

२. प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा ‘गुरु से मिलने जाते समय भक्तों को मन में संदेह नहीं रखना चाहिए’, यह सिखाया जाना

मेरे पिता (स्व. वामन जोग) ने प.पू. भक्तराज महाराजजी के पास जाना आरंभ किया । उस समय वे प.पू. रामानंद महाराजजी के (रामजीदादा के) घर में रह रहे थे । उनके घर में केवल २ छोटे कक्ष थे । उस समय उस घर में बहुत आना-जाना रहता था । ऐसे ही एक बार मैं प.पू. बाबा के पास गया था । प.पू. बाबा भोजन कर रहे थे । मुझे लगा ‘किसी के भोजन के समय नहीं जाना चाहिए’, अत: मैंने सुनिश्चित किया कि ‘प.पू. बाबा के भोजन के समय में नहीं जाऊंगा’ । उसके उपरांत मैं उनके पास सवेरे ६ से रात ११ बजे के बीच अनेक बार समय बदल-बदल कर गया; परंतु प्रत्येक बार मुझे प.पू. बाबा भोजन करते हुए ही दिखाई देते । तब मैंने निश्चय किया कि अब मुझे कोई भी विचार न करते हुए उनके पास जाना है । उसके पश्चात प.पू. बाबा के पास जाने पर वे मुझे भोजन करते हुए दिखाई नहीं दिए । इससे ‘भक्तों को गुरु से मिलने जाना है, तो मन में संदेह लेकर नहीं जाना चाहिए’, यह मुझे प.पू. बाबा ने सिखाया तथा यह सूत्र मेरे मन पर अंकित हो गया ।

श्री. अनिल जोग

३. प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा भक्त के मन के विचार जानना

वर्ष १९९२ की दीपावली में लक्ष्मीपूजन के दिन उज्जैन में प.पू. बाबा ने नारायणसेवा का भंडारा रखा था (इसमें भिखारियों को भोजन दिया जाता है) । उस समय उन्होंने हमें बताया, ‘‘आप भिखारियों में श्री नारायण को देखें तथा उन्हें महाप्रसाद दें ।’’ वहां के रसोईयों ने बहुत ही स्वादिष्ट एवं प्रेमपूर्वक महाप्रसाद बनाया था । मुझे लगा कि मैं उस रसोईए को ५१ रुपए दूं; परंतु मेरी स्थिति ऐसी हुई कि मैं पैसे नहीं दे पाया । इंदौर लौटने के कुछ दिन पश्चात मैं आश्रम गया । प.पू. बाबा को नमस्कार करने पर वे मुझे कहने लगे, ‘‘उज्जैन का भंडारा अच्छा था । उस रसोईए ने कितने प्रेमपूर्वक भोजन बनाया था । आपको ऐसा नहीं लगा कि उसे पुरस्कार के रूप में ५१ रुपए देने चाहिए ।’’ यह सुनते ही मुझे मन ही मन में खेद लगा ।

४. प.पू. भक्तराज महाराजजी का भक्तों की इच्छा पूर्ण करना

एक दिन रात १० बजे तक मैं आश्रम में था । वहां मुझे ज्ञात हुआ कि एक दिन पूर्व ही डॉक्टर ने प.पू. बाबा को मक्का न खाने के लिए कहा था; परंतु उस दिन आश्रम में जितने भी भक्त आए, वे मक्के से बने पदार्थ लाए थे, उदा. मक्के का किस, मक्के की कचोरी, मक्के की सब्जी, मक्के की खीर इत्यादि । सबसे अंत में रात १० बजे श्री. सतीश कर्णिक मक्के से बना केसर का दूध लेकर आए । तब प.पू. बाबा ने कहा, ‘‘अरे, इन डॉक्टरों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती ? सभी इतने प्रेम से मक्के के पदार्थ लेकर आए और डॉक्टर कहते हैं, ‘‘आप मत खाईए !’’

५. प.पू. भक्तराज महाराजजी की बातें आरंभ में तर्कहीन लगना; परंतु उनकी बातें सत्य होना

५ अ. प.पू. भक्तराज महाराजजी की कृपा से नौकरी में पदोन्नति मिलना : वर्ष १९८४ में मैं मध्य प्रदेश वित्त निगम में (मध्य प्रदेश फाइनांस कार्पाेरेशन में) ‘टेक्निकल एडवाइजर’ के पद पर नौकरी कर रहा था । हमारे विभाग में ‘मैनेजर टेक्निकल’ सबसे बडा पद था । एक दिन प.पू. बाबा ने मुझसे कहा, ‘‘मुझे तुम्हें ‘जनरल मैनेजर’ के पद पर बिठाना है ।’’ हमारी ‘टेक्निकल’ विभाग की रचना के कारण तथा विभाग में यह पद ही न होने के कारण मेरी पदोन्नति कभी नहीं हो सकती थी । इसलिए मुझे आरंभ में प.पू. बाबा की बातें तर्कहीन लगी । कुछ वर्ष उपरांत हमारे प्रतिष्ठान में श्री. आर.के. शर्मा नामक एक प्रबंध निदेशक (‘मैनेजिंग डाइरेक्टर) आए ।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘आपके ‘टेक्निकल सेल’ के कारण (विभाग के कारण) मेरे बेटे की हानि हुई है । जोगसाहब, मैं आपके ‘टेक्निकल सेल’ प्रतिष्ठान का मुख्य विभाग में विलय करूंगा ।’’ इसलिए इस विभाग में कार्यरत किसी को भी निदेशक के पद पर पदोन्नति मिल सकती थी । इससे मेरा पदोन्नति का मार्ग प्रशस्त हुआ । प.पू. बाबा के देहत्याग के उपरांत उनकी कृपा से ही मैं ‘जनरल मैनेजर’ बन गया । प.पू. बाबा की कृपा से ‘जनरल मैनेजर’ के पद पर काम करते समय २ बार मुझे अन्य प्रबंध निदेशक के आने तक प्रभारी के रूप में ‘प्रबंध निदेशक’ के रूप में कार्यभार देखने का अवसर मिला था ।

५ आ. प.पू. भक्तराज महाराजजी की कृपा से कपडों की दुकान सवेरे खुली होना : एक बार प.पू. बाबा के पास आंध्र प्रदेश से २ संत आए थे । प.पू. बाबा ने कहा, ‘‘उनके रूप में प.पू. अनंतानंद साईश एवं भुरानंद बाबा यहां आए हैं ।’’ सवेरे ७.३० बजे प.पू. बाबा ने मुझसे कहा, ‘‘तुम बाजार में जाकर अच्छी रेशमी धोतियां लेकर आओ ।’’ मैंने ‘हां’ कहा । उसके ५ मिनट उपरांत उन्होंने मुझे देखकर कहा, ‘‘अरे, तुम अभी नहीं गए !’’ उस पर मैंने कहा, ‘‘कपडों की दुकानें तो सवेरे १० – १०.३० बजे के पश्चात खुलती हैं ।’’उन्होंने कहा, ‘‘तुम अभी के अभी जाओ । दुकान खुली नहीं हो, तो उसके खुलने तक दुकान की सीढी पर बैठे रहो ।’’ मैं तुरंत बाजार चला गया तथा वहां मैंने देखा कि रेशमी धोती की एक ही दुकान खुली थी ।

ऐसी अनेक बाते हैं कि जब आरंभ में प.पू. बाबा की बातें तर्कहीन लगती थीं; परंतु गुरु की कोई भी बात तथा उनका व्यवहार वैसा नहीं होता । अर्थात वे जो बोलते हैं, वह हमें उस समय समझ में नहीं आता; इसलिए हमें वैसा लगता है; परंतु उसके कुछ समय उपरांत बातों में छिपा अर्थ समझ में आता है ।’

सनातन के प्रेरणास्रोत प.पू. भक्तराज महाराजजी के चरणों में सनातन परिवार का कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार !

– श्री. अनिल जोग (न्यासी, श्री सद्गुरु अनंतानंद साईश शैक्षणिक एवं पारमार्थिक सेवा ट्रस्ट), इंदौर, मध्य प्रदेश. (२७.६.२०२५)

इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक