
‘श्रीसत्शक्ति’ और ‘श्रीचित्शक्ति’ ब्रह्मांड की शक्ति है । वह देह नहीं है । वह निर्गुण की शक्ति है । उस शक्ति को हम भी नमस्कार करते हैं । वह हमारा भाव है । ‘वह शक्ति हम ही हैं’, ऐसा नहीं है । हमें तो उसकी अनुभूति भी नहीं होती; इसलिए तो वे उपाधियां हमें दी गई हैं, अन्यथा उसी से हमारा अहं बढ जाता और हमारा पतन हो जाता । जब सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के मन में यह आता है कि ‘अब पतन नहीं होगा’, तभी वह उपाधि दी जाती है । ‘सत्शक्ति, चित्शक्ति और सच्चिदानंद’ अध्यात्म के शब्दब्रह्म हैं । इन शब्दों में अत्यधिक शक्ति है । उन शब्दों का उच्चारण करने पर उनसे चैतन्य और तत्त्व प्राप्त होता है । उस शब्दब्रह्म को हमारा नमस्कार है । हमें उस स्तर तक पहुंचना है । वह देह नहीं, तत्त्व है । वह प्रकाशमान ब्रह्म है और कहीं न कहीं विराजमान है । हमें यह अपेक्षा नहीं रहती कि कोई हमें ‘श्रीसत्शक्ति’ और ‘श्रीचित्शक्ति’ कहकर संबोधित करे । कोई भी शब्द उच्चारित किया जाए, तो उसके साथ उसकी शक्ति भी आती है । अर्थात प्रकृति के नियमानुसार ‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और शक्ति’ इनका सहअस्तित्व होता है । ‘श्रीसत्शक्ति’ कहने पर उन शब्दों में स्थित चैतन्य तत्काल हमारे शरीर में प्रवेश करता है ।
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ, कांचीपुरम्, तमिलनाडु. (२१.९.२०२५)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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