आध्यात्मिक उपचारों के संदर्भ में यह ध्यान रखें !

आध्यात्मिक उपचार के रूप में नामजप करनेवाले साधक आरंभ में प्राणशक्ति प्रणाली के अनुसार ढूंढा हुआ नामजप कर उसके उपरांत रामनाम का नामजप करें

सनातन के ग्रंथों-लघुग्रंथों की १ करोड से अधिक प्रतियां प्रकाशित !

मार्च २०२६ तक हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, कन्नड, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला, ओडिया, असमिया, पंजाबी एवं नेपाली, इन १३ भाषाओं में सनातन के ३७० ग्रंथ-लघुग्रंथ प्रकाशित हुए हैं तथा उनकी १ करोड २ लाख प्रतियां प्रकाशित हुई हैं ।

शिष्य को केवल गुरुकृपा से मोक्ष प्राप्त हो सकता है, यह बतानेवाला सनातन का ग्रंथ : गुरु-शिष्य परंपरा

गुरु का आचरण, कार्य एवं गुरुपरम्परा
गुरु का शिष्यों को सिखानाएवं गुरु-शिष्य सम्बन्ध

आपातकाल से पूर्व ग्रंथों के माध्यम से धर्मप्रसार कर, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ग्रंथ-निर्मिति के कार्य की सेवा में सम्मिलित हों !

हिन्दू राष्ट्र कुछ सहस्र वर्षाें तक टिका रहेगा; परंतु ग्रंथ में समाहित ज्ञान अनंत काल तक टिका रहेगा; इसलिए जैसे हिन्दू राष्ट्र शीघ्र आना आवश्यक है, उतनी ही शीघ्रता भीषण आपातकाल का आरंभ होने से पूर्व इन ग्रंथों को प्रकाशित करने की है ।

विश्वकल्याण हेतु हिन्दू राष्ट्र का उद्घोष करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ.जयंत आठवलेजी का संक्षिप्त चरित्र !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी (गुरुदेवजी) का यह संक्षिप्त चरित्र ! ‘अखिल मानवजाति को गुरुदेवजी का माहात्म्य ज्ञात हो तथा उनकी सीख के अनुसार साधना कर सब आनन्दित हो’, यह इस लेख का प्रधान हेतु है ।

आपातकाल से पूर्व ग्रंथों के माध्यम से धर्मप्रसार कर, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ग्रंथ-निर्मिति के कार्य की सेवा में सम्मिलित हों !

ग्रंथसेवा श्रेष्ठ ज्ञानशक्ति के स्तर की सेवा है, इसलिए यह सेवा शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति करानेवाली सेवा भी है । अतः साधको, अपनी रुचि एवं क्षमता के अनुसार ग्रंथ-निर्मिति की इस सेवा में सम्मिलित होकर इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाएं !

आपातकाल से पूर्व ग्रंथों के माध्यम से धर्मप्रसार कर, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ग्रंथ-निर्मिति के कार्य की सेवा में सम्मिलित हों !

भीषण आपातकाल का आरंभ होने से पूर्व ही सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ग्रंथ-निर्मिति के कार्य में सम्मिलित होकर शीघ्र ईश्वरीय कृपा के पात्र बनें !

हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु ‘आपातकाल से पूर्व ग्रंथों के माध्यम से अधिकाधिक धर्मप्रसार’ होने के उद्देश्य से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का संकल्प कार्यरत हो गया है । अतः उनकी अपार कृपा प्राप्त करने के लिए इस कार्य में पूर्ण लगन से सम्मिलित हों !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी जैसी महान विभूति के संकल्प के अनुसार साधक भी यदि ग्रंथ कार्य गति से होने के लिए लगन से प्रयास करें, तो साधकों को इस संकल्प का फल मिलेगा; अर्थात ही साधकों की आध्यात्मिक उन्नति गति से होगी ।

साधकों को सेवा करते समय प्रति १-२ घंटे के उपरांत व्यष्टि साधना के प्रयास करना आवश्यक ! 

साधकों के द्वारा निरंतर सेवा अथवा व्यक्तिगत कामों को प्रधानता दिए जाने से उनके आध्यात्मिक उपचार तथा व्यष्टि साधना के प्रयास अच्छे ढंग से नहीं होते । इसके परिणामस्वरूप उनके कष्ट बढते हैं

साधको, जिन पर स्वयं की सेवाओं का दायित्व है, उन साधकों को समझो !

साधकों ने भी ‘हम स्वयं उत्तरदायी साधक हैं’, इस भूमिका में जाकर विचार किया, तो उन्हें उन साधकों को समझना सरल होगा, उनकी समस्याएं भी ध्यान में आएंगी तथा उनके प्रति एक प्रकार की नकारात्मक अथवा कडवाहट की भावना अल्प होने में सहायता मिलेगी ।