सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के माथे पर अंकित कमल सुस्पष्टता से दिखाई देने का कारण !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के माथे पर अंकित कमल सुस्पष्ट दिखाई देने का क्या कारण है ? वर्ष २०११ एवं वर्ष २०१२ की अवधि में उस कमल की ४ पंखुडियां अस्पष्ट दिखाई देती थीं तथा वर्ष २०१३ में वे सुस्पष्ट दिखाई देने लगी । ‘कमल का सुस्पष्ट होना’ क्या दर्शाता है ?

‘श्री गुरु पर श्रद्धा’, यही भवसागर से पार होने की एकमात्र गुरुकुंजी !

ऐसे महान अवतारी गुरु के श्री चरणों में साधकों की श्रद्धा कैसी होनी चाहिए ? गुरु के अस्तित्व अथवा उनके कार्य पर तनिक भी संदेह न करते हुए, ‘मेरे गुरु जो कर रहे हैं, वह मेरे कल्याण के लिए ही है’, ऐसा दृढ भाव मन में रखना ही श्रद्धा है ।

‘जहां जाऊं मैं, वहां गुरुदेवजी आप ही हैं !’

इस लेखमाला में ‘ईश्वर साधकों का कैसे ध्यान रखते हैं ?’, इससे संबंधित प्रसंग दे रहे हैं । इससे ‘जहां जाऊं, वहां आप मेरे सहयात्री !’, यह संतवचन कितना सार्थ है, यह ध्यान में आएगा ।

साधको, शब्दशक्ति के माध्यम से संदेह फैलाने हेतु सक्रिय सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियों की चाल पहचानकर साधना बढाओ !

वर्तमान में सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियां साधकों की श्रद्धा को भंग कर उन्हें साधना से दूर करने के लिए ‘शब्दशक्ति’ के माध्यम से बडे स्तर पर सूक्ष्म युद्ध कर रही हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ‘इदं न मम ।’, इस लेखन का अध्यात्मशास्त्रीय विश्लेषण !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजीे की अहंरहित अवस्था के कारण उनके द्वारा ज्ञानकार्य का श्रेय साधकों को दिया जाना 

ईश्वर की इच्छा कैसे पहचानें ?

एक बार मैं आंखें बंद कर जप कर रहा था, तभी मेरे मन में विचार आने लगे, ‘आज तक गुरुदेव ने हमें इतना ज्ञान दिया, इतना सिखाया, अनेक अनुभूतियां दीं, ईश्वरप्राप्ति को शीघ्र करने के अनेक मार्ग बताए, तब भी हमें कुछ बातें अभी तक समझ में नहीं आतीं ।’

ग्रंथवाचन एवं ग्रंथों के लिए चिन्हित कतरनों से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का ध्यान में आया ईश्वरत्व !

अनेक लोगों को उनके द्वारा पढे गए लेखन से महत्त्वपूर्ण सूत्रों को अलग निकालकर रखने की तथा कतरनों को संदर्भ के रूप में संजोकर रखने की आदत होती है । उससे उनके गुण भी प्रकट होते हैं; परंतु इससे केवल ईश्वर ही अन्यों को अनुभूति दे सकते हैं । इस सेवा के माध्यम से अन्यों में गुणवृद्धि करनेवाले तथा उन्हें चैतन्य प्रदान करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमात्र हैं ।

आपातकाल की बढती तीव्रता में स्थिर रहने के लिए तीव्र साधना आवश्यक है ! – श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ

इटली में रहनेवाली और एक संप्रदाय के अनुसार साधना करनेवाली एक दीदी का मुझे फोन आया । उन्होंने कहा, ‘‘यहां की वर्तमान स्थिति देखकर मेरा मन बहुत ही विषण्ण (दु:खी) हो गया है । (उस समय पूरे विश्व में कोरोना नामक विषाणुजन्य महामारी फैली हुई थी । – संकलनकर्ता) मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है । इटली की गंभीर स्थिति पूरे विश्व को ज्ञात है । भारत में दो साधुओं की हत्या हुई, यह भी सुना । चारों ओर जो हाहाकार मचा है, उसे देखकर मैं और भी निराश हो गई हूं ।

कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तियोग के क्रम में हुई परम पूज्य डॉक्टरजी की आध्यात्मिक यात्रा

‘मैंने वर्ष १९८२ तक सम्मोहन उपचार विशेषज्ञ के रूप में व्यवसाय और शोध किया । वर्ष १९८३ से १९८६ के दौरान विभिन्न संतों के पास जाने पर अध्यात्म, संत, यह सब सत्य है, इसका मुझे विश्वास हो गया ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ‘हिन्दू राष्ट्र आएगा’, केवल इतना कहते ही नहीं, अपितु उसे साकार करने के लिए भी प्रयत्नरत !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजीे ने वर्ष २०१२ में केवल हिन्दू राष्ट्र के विषय में ही नहीं बताया, अपितु ‘उसके लिए क्या प्रयास करने चाहिए ?’ यह भी बताया और वे इसके लिए प्रयास भी करवा रहे हैं :