यज्ञ करने के पीछे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी का व्यापक एवं उदार उद्देश्य !

वैदिक धर्मपरंपरा में यज्ञ केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, अपितु उसे समष्टि के कल्याण हेतु दिव्य साधना माना गया है । हमारे ऋषि-मुनियों ने यज्ञसंस्कृति के द्वारा विश्वकल्याण का मार्ग दिखाया । उस परंपरा को आगे बढाते हुए गुरुदेवजी ने अब तक विभिन्न यज्ञों का आयोजन किया है ।

झारखंड एवं पूर्वोत्तर भारत में ‘रामराज्य निर्माण अभियान’ के अंतर्गत विविध उपक्रम संपन्न

सनातन संस्था द्वारा आयोजित इस अभियान के अंतर्गत जमशेदपुर, धनबाद एवं कोलकाता के विभिन्न मंदिरों में ‘मनौती मांगना’, ‘मंदिर स्वच्छता अभियान’ जैसे उपक्रम आयोजित किए गए ।

साधको, शब्दशक्ति के माध्यम से संदेह फैलाने हेतु सक्रिय सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियों की चाल पहचानकर साधना बढाओ !

वर्तमान में सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियां साधकों की श्रद्धा को भंग कर उन्हें साधना से दूर करने के लिए ‘शब्दशक्ति’ के माध्यम से बडे स्तर पर सूक्ष्म युद्ध कर रही हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !

गुरुदेवजी को देखकर सभी भावविभोर हो गए । उसी प्रकार, सभी को सामने देखकर गुरुदेवजी के मुखमंडल पर भी आनंद एवं कृतज्ञभाव दिखाई दे रहा था । महोत्सव अंतर्गत गुरुदेवजी की यह अत्यंत मनमोहक भावमुद्रा है !

ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

गुरु का वास्तविक स्वरूप केवल उनके मानवी अथवा सगुण देह तक सीमित नहीं होता । गुरु मूलतः एक ‘निर्गुण’ तत्त्व हैं । निर्गुण रूप में गुरु आकाश के समान अथाह, अनंत एवं सर्वव्यापी होते हैं । उन्हें स्थल, काल अथवा समय की कोई मर्यादा नहीं होती ।

सनातन आश्रम, रामनाथी के भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ ‘आयुष्य होम’ !

‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का महामृत्युयोग टले एवं उन्हें उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त हो, साथ ही साधकों को भी उत्तम स्वास्थ्य मिले एवं उनकी साधना अच्छे से होकर उनकी रक्षा हो’, इस उद्देश्य से सप्तर्षि जीवनाडी-पट्टिका में किए उल्लेख के अनुसार, यहां सनातन आश्रम में ८ मई को ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ ।

विश्वकल्याण के लिए हिन्दू राष्ट्र का उद्घोष करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का संक्षिप्त चरित्र

आनंदमय जीवन के लिए साधना, साथ ही राष्ट्र एवं धर्मकार्य करने हेतु प्रेरणा एवं दिशा प्रदान करनेवाला यह ग्रंथ एक चैतन्यमय प्रासादिक धरोहर ही है ! 

साधको, शब्दशक्ति के माध्यम से संदेह फैलाने हेतु सक्रिय सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियों की चाल पहचानकर साधना बढाओ !

वर्तमान में सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियां साधकों की श्रद्धा को भंग कर उन्हें साधना से दूर करने के लिए ‘शब्दशक्ति’ के माध्यम से बडे स्तर पर सूक्ष्म युद्ध कर रही हैं ।

‘जहां जाऊं मैं, वहां गुरुदेवजी आप ही हैं !’

इस लेखमाला में ‘ईश्वर साधकों का कैसे ध्यान रखते हैं ?’, इससे संबंधित प्रसंग दे रहे हैं । इससे ‘जहां जाऊं, वहां आप मेरे सहयात्री !’, यह संतवचन कितना सार्थ है, यह ध्यान में आएगा ।

साधको, आनेवाले आपातकाल का सामना करने के लिए श्रद्धा के बल पर साधना में आनेवाली बाधाओं पर विजय प्राप्त करो !

वर्तमान में संपूर्ण विश्व आपातकाल की सीमा पर खड़ा है। युद्ध, प्राकृतिक आपदाएं, कोरोना जैसी महामारी आदि विभिन्न माध्यमों से आपातकाल कभी भी आ सकता है। आज तक ईश्वर ने हमारी साधना होने के लिए इस काल को रोककर रखा है; परंतु वह आज न कल आनेवाला ही है