‘रामनाथी, गोवा के सनातन संस्था के आश्रम में प्रतिदिन अनेक जिज्ञासु आते हैं । उस समय ‘आश्रम में रहनेवाले साधक अपना घरबार त्यागकर पूर्णकालीन धर्मकार्य कर रहे हैं’, यह देखकर अनेक लोगों के मन में कुछ प्रश्न उठते हैं, ‘आपका आगे कैसे होगा ?’, ‘आप अपने माता-पिता का ध्यान कैसे रखेंगे ?’ आदि जिज्ञासुओं के मन में उठनेवाले प्रश्न ‘काल के अनुरूप अनुचित हैं’, ऐसा नहीं कहा जा सकता । इसका कारण यह है कि अधिकांश लोगों को ऐसा लगता है, ‘पैसा होगा, तभी जीवन सुखी होगा !’; परंतु जब हम साधना करने लगते हैं, तब हमारा ध्यान ईश्वर ही रखते हैं । अनेक साधकों ने इसकी अनुभूति की है । इस लेखमाला में ‘ईश्वर साधकों का कैसे ध्यान रखते हैं ?’, इससे संबंधित प्रसंग दे रहे हैं । इससे ‘जहां जाऊं, वहां आप मेरे सहयात्री !’, यह संतवचन कितना सार्थ है, यह ध्यान में आएगा । निम्नांकित प्रसंग पढकर हमने यदि साधना आरंभ की, तो ‘ईश्वर की कृपा से आपका कल्याण होगा’, इसके प्रति मैं आश्वस्त हूं ।
संकलनकर्ता : श्री. योगेश जलतारे, समूह संपादक, ‘सनातन प्रभात’ प्रसारमाध्यम
गुरुदेवजी की स्थूल से प्रीति दर्शानेवाले छायाचित्र !

‘जहां जाऊं मैं, वहां आप ही हैं !’, इस वचन को सार्थ बनानेवाली इस लेख में दी गईं सभी अनुभूतियों में कहीं भी स्थूल से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ.जी का अस्तित्व नहीं है, जबकि उनका तत्त्व अर्थात गुरुतत्त्व कार्यरत है । साधक ही उनके सबकुछ हैं । साधकों के प्रति प्रीति के कारण ही जिस प्रकार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी सूक्ष्म से साधकों का ध्यान रखते हैं, वैसे ही वे स्थूल से भी रखते हैं । इस लेख के साथ दिए गए विभिन्न छायाचित्रों के माध्यम से हम गुरुदेवजी की साधकों के प्रति प्रीति का अनुभव करेंगे !
साधक एवं उसके परिजनों को मिली ईश्वरीय शक्ति की प्रतीति !
प्रसंग १ : पडोसियों द्वारा सहायता कर दी गई कृपा की प्रतीति !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को श्रद्धापूर्वक आत्मनिवेदन करने पर पिताजी के रक्त की उचित रिपोर्ट मिलना

१ अ. मैं पूर्णकालीन साधक के रूप में ठाणे सेवाकेंद्र में रह रहा था । एक बार अकस्मात मेरे पिताजी के रक्त में शक्कर का स्तर बढ गया । इसलिए अकोला में हमारे पडोस में रहनेवाले एक परिचित व्यक्ति ने उन्हें चिकित्सालय में भर्ती किया । उसके उपरांत उन्होंने दूरभाष कर मुझे सूचित किया तथा मुझ पर बहुत चिल्लाकर कहने लगे, ‘‘तुम लोग माता-पिता का ध्यान नहीं रखते तथा सनातन के पीछे घूमते रहते हो !’ मैंने उनसे कहा, ‘‘मैं नौकरी के लिए यदि किसी दूसरे शहर में होता, तब भी यह स्थिति आती ही न ! प्रत्येक जीव का ध्यान रखनेवाले ईश्वर ही हैं । इस समय उन्होंने आपके माध्यम से मेरे पिताजी की सहायता की । मैं यदि वहां होता, तो आपने जो किया, उससे अधिक मैं क्या कर पाता ?’’ यह सुनकर उस परिचित व्यक्ति ने क्रोध से दूरभाष रख दिया ।
१ आ. उसके उपरांत मैंने सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को पिताजी के विषय में आत्मनिवेदन कर बताया । दूसरे दिन उसी परिचित व्यक्ति ने दूरभाष कर मुझे बताया, ‘‘डॉक्टर ने पुनः आपके पिता के रक्त का परीक्षण करने के लिए कहा, तब ‘उनके रक्त का पहले जो परीक्षण किया था, वह गलत था’, ऐसा दिखाई दिया है । आपके पिताजी को चिकित्सालय से घर भेज दिया गया है ।’’ इस माध्यम से परिचित व्यक्ति को भी गुरुदेवजी की कृपा की प्रतीति हुई ।
१ इ. उस परिचित व्यक्ति का जब निधन हुआ, उस समय उनके बच्चे नौकरी एवं व्यवसाय के कारण अन्य शहर में रहते थे तथा उनके साथ नहीं थे । उनकी मृत्यु के पश्चात उनका सबकुछ पडोस में रहनेवाले लोगों को ही करना पडा; परंतु मेरे पिता के अंतिम समय में हम सब भाई उनके पास थे तथा हम उनकी सेवा भी कर पाए ।
प्रसंग २ : सूक्ष्म से स्थूल के दिशादर्शक !
कुलदेवता के दर्शन के स्थान पर माता-पिता के एक-दूसरे से बिछड जाने पर प.पू. डॉक्टरजी द्वारा ही मां को पिताजी के पास लाकर छोडा जाना
एक बार मेरे माता-पिता (सनातन के साधक स्व. वामनराव जलतारे एवं सनातन की ९५वीं संत पू. (श्रीमती) कुसुम जलतारेजी, आयु ८६ वर्ष) हमारी कुलदेवी के दर्शन के लिए श्री रेणुकादेवी के शक्तिपीठ माहूर (जि. नांदेड, महाराष्ट्र) गए थे । माहूर में श्रद्धालुओं की बहुत भीड होने से माता-पिता एक दूसरे से बिछड गए तथा मेरी मां अज्ञातवश श्री कालिकामाता मंदिर की ओर जाने लगीं । तब एक सज्जन उन्हें मिले तथा उन्होंने मां को मेरे पिताजी के पास लाकर छोडा । कुछ महिने पश्चात मां ने जब प.पू. डॉक्टरजी का छायाचित्र देखा, तब उनके ध्यान में आया कि उनका हाथ पकडकर मेरे पिता के पास लाकर छोडनेवाले प.पू. डॉक्टरजी ही थे !’ – श्री. योगेश जलतारे
प्रसंग ३ : सूक्ष्म से स्थूल में संभालनेवाले !
दौडती रेल में पिता का संतुलन खो जाने पर जिस व्यक्ति ने उन्हें संभाला, वे परात्पर गुरु डॉक्टरजी ही थे !
एक बार मेरे पिताजी रेल से अन्यत्र जा रहे थे । उस समय रेलस्थानक पर बहुत भीड थी, इसलिए उन्हें रेल के डिब्बे में चढने में समय लगा । कुछ समय पश्चात जब रेल दौडने लगी, तब पिताजी अपना संतुलन खो बैठे । वे नीचे गिरने ही वाले थे कि तुरंत एक व्यक्ति ने उनका हाथ पकडकर उन्हें संभाला । तब तक पिताजी ने प.पू. डॉक्टरजी को प्रत्यक्षरूप से देखा नहीं था । उसके कुछ दिन उपरांत उन्होंने जब सनातन-निर्मित ‘साधना’ विषय की ऑडियो सीडी पर प.पू. डॉक्टरजी का छायाचित्र देखा, उसे देखकर पिताजी ने मुझे बताया, ‘‘जब रेल में मेरा संतुलन खोया था, उस समय मेरा हाथ पकडनेवाले ये ही थे !’’
– श्री. योगेश जलतारे
साधकों की प्रशंसा कर उन्हें प्रोत्साहन देना

व्याधि के विषय में आस्था से पूछताछ करना

साधकों में घुल-मिलकर उन्हें आनंद देना

अध्यात्म में संयोग नहीं होते, अपितु वह गुरुकृपा ही होती है !
इस लेख में साधकों को प्राप्त अनुभव एवं अनुभूतियां पढते समय पाठकों को वे चमत्कारसद्ृश्य लग सकती हैं अथवा कुछ बुद्धिजीवी इन घटनाओं को ‘संयोग’ भी कहेंगे; परंतु अध्यात्मशास्त्र के अनुसार ‘संयोग’ नहीं होते । जिनकी ईश्वर अथवा अपने गुरुदेव पर श्रद्धा होती है, उनके लिए ‘ईश्वर स्वयं अथवा अन्यों के माध्यम से कैसे दौडे चले आते हैं’, यहां इसके कुछ उदाहरण दिए हैं । ये उदाहरण आपको बुद्धि-अगम्य लग सकते हैं; परंतु ये घटनाएं वास्तव में घटित हुई हैं । – श्री. योगेश जलतारे
गुरुदेवजी के संदर्भ में मुझे ज्ञात सनातन संस्था के कुछ साधकों को प्राप्त अनुभूतियां !
प्रसंग १ : आपातकालीन घटना से बचाना !
भीषण रेल दुर्घटना से बचाकर प.पू. डॉक्टरजी द्वारा एक साधक को दिया गया जीवनदान !
१. संस्था के आरंभिक काल में अकोला के एक साधक बीच-बीच में सेवा के लिए मुंबई स्थित प.पू. डॉक्टरजी के आवास में स्थित सेवाकेंद्र आते थे । ऐसे ही एक बार वे सेवा के लिए आए तथा सेवा पूर्ण होने के उपरांत अकोला जाने के लिए निकले । उस समय प.पू. डॉक्टरजी एक अन्य सेवा में व्यस्त थे । कुछ समय पश्चात बाहर आकर प.पू. डॉक्टरजी ने वहां के साधकों को उस अकोला के साधक के विषय में पूछा, तब साधकों ने बताया, ‘वे साधक कुछ ही समय पूर्व ऑटो से चले गए हैं ।’
२. वे साधक रेल्वेस्थानक पहुंचे, तब कल्याण में रहनेवाले उनके साले उनसे मिले । उन्होंने उस साधक को बताया, ‘आपके डॉ. आठवले दूसरे प्लेटफॉर्म पर आपको ढूंढ रहे हैं ।’ यह सुनकर वह साधक प.पू. डॉक्टरजी को ढूंढने लगे । उतने में उस साधक की रेल निकल गई । इसलिए उन्हें बाध्य होकर कल्याण में उनके संबंधी के घर रहने के लिए जाना पडा । साधक के संबंधी उन्हें सूचित कर पहले ही अपने घर जा चुके थे ।
३. साधक जब उनके साले के घर पहुंचे, तब उनके साले को इसका आश्चर्य हुआ; क्योंकि उनकी जानकारी के अनुसार साधक अकोला जानेवाले थे । साधक ने जब कुछ समय पूर्व रेलस्थानक में घटित घटना बताई, तब उनके साले ने कहा, ‘‘मैं आपसे मिला ही नहीं । मैं आज कल्याण छोडकर कहीं नहीं गया ।’’ तब साधक को इसका बहुत आश्चर्य हुआ । रेल छूट जाने से तथा उनके सामने अन्य कोई विकल्प न होने से उन्हें वहीं रहना पडा ।
दूसरे दिन साधक को ज्ञात हुआ कि वे जिस रेलगाडी से अकोला जानेवाले थे, वह गाडी भुसावळ के पास दुर्घटनाग्रस्त हुई थी तथा साधक ने जिस डिब्बे का आरक्षण किया था, वह डिब्बा संपूर्णरूप से दब गया था । तब साधक को इस प्रसंग के पीछे का कार्यकारणभाव ध्यान में आया तथा उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि प.पू. डॉक्टरजी ने ही उन्हें इस दुर्घटना से बचाया है ।
– श्री. योगेश जलतारे
प्रसंग २ : सूक्ष्म के अस्तित्व से आधार बन जाना !
छत्रपति संभाजीनगर के साधक को अस्वस्थ स्थिति में, अतिदक्षता विभाग में सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी निरन्तर साथ हैं, इसकी प्रतीति होना !
१. पक्षाघात का झटका आने से एक साधक को चिकित्सालय के अतिदक्षता विभाग में भर्ती करने की स्थिति आना तथा कोरोना के कारण परिजनों का उनके साथ न रह पाना : वर्ष २०२० -२०२१ में छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र) के एक साधक पक्षाघात का झटका आने से बीमार हुए । उसके उपरांत उस साधक की स्थिति अत्यंत गंभीर होने से उन्हें चिकित्सालय के अतिदक्षता विभाग में भर्ती करना पडा । वह काल कोरोना महामारी का था । इसलिए प्रत्येक चिकित्सालय में बहुत भीड तथा खाटों का अभाव, जैसी स्थिति थी । परिजन रोगी के साथ चिकित्सालय में नहीं रह सकते थे । इसलिए उस साधक के परिजन चिकित्सालय की सीढियों पर ही सो जाते थे तथा चिकित्सालय के द्वार पर ही परिजन वहां के डॉक्टरों के साथ बात कर पाते थे । इस प्रकार वे साधक लगभग ३ – ४ महिनों तक अतिदक्षता विभाग में थे ।
२. बीमार साधक का कहना, ‘प.पू. डॉक्टरजी, आप मुझे क्षमा करें’ तथा डॉक्टर द्वारा ‘प.पू. डॉक्टरजी कौन हैं ?’, ऐसा पूछा जाना : थोडा स्वस्थ लगने के उपरांत साधक को जब घर भेज दिया गया, तब वहां के डॉक्टर उनके स्वास्थ्य के विषय में कहने लगे, ‘‘ऐसे रोगियों को प्रचंड पीडा होती रहती है, इसलिए वे चिल्लाते हैं ।’’ इसीलिए कभी-कभी उन्हें बांधकर भी रखना पड़ता है; परंतु यह मरीज (साधक) केवल यही कह रहा था, ‘प.पू. डॉक्टर, मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं फिर कभी ऐसी गलती नहीं करूँगा’ । डॉक्टरों ने उत्सुकतावश रिश्तेदारों से पूछा,‘ये प.पू. डॉक्टर कौन हैं ’ ? तब रिश्तेदारों ने बताया कि, ‘‘वे हमारे गुरु हैं ’’ ।
३. बीमारी से ठीक होने के बाद साधक का यह बताना कि ‘बीमारी के दौरान सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टर लगातार मेरे साथ थे, इसलिए मुझे कोई कष्ट नहीं हो रहा था’: बीमारी से पूरी तरह ठीक होने के बाद उस साधक ने अपनी अनुभूति बताते हुए कहा, “बीमारी के पूरे समय में मुझे किसी भी बात का होश नहीं था और मुझे कोई कष्ट भी नहीं हो रहा था। मुझे केवल इतना ही याद है कि, ‘मैं प.पू. डॉक्टर के साथ था। उनके साथ मेरा निरंतर संवाद चल रहा था। प.पू. डॉक्टर मुझे मेरी और सह-साधकों की समष्टि सेवा (सामूहिक आध्यात्मिक सेवा) की गलतियाँ बता रहे थे। उन गलतियों के लिए मैं प.पू. डॉक्टर के चरणों में क्षमा-याचना कर रहा था। मुझे बस इतना ही याद है’ ।
वास्तव में संबंधित साधक की वह बीमारी जानलेवा थी। सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टर ने न केवल उन्हें उस बीमारी से बाहर निकाला, बल्कि बीमारी के दौरान लगातार उनके साथ रहकर उन्हें दर्द का अहसास तक नहीं होने दिया। गुरुमाऊली (गुरु रूपी माता) अपने एक साधक के लिए इससे बढकर और क्या कर सकती हैं ?
– श्री. योगेश जलतारे
बीमारी में साधकों को प्रेमपूर्वक आधार देना

साधकों को संतों के आशीर्वाद दिलवाना

प्रीतिस्वरूप एवं आनंददायक मधुर बातें करना

आनेवाले आपातकाल में साधक निर्भय होकर श्रद्धापूर्वक साधना करें !
उक्त अनुभूति पढने के उपरांत ‘ईश्वर एवं गुरु किस प्रकार श्रद्धालु साधकों का एवं भक्तों की चिंता करते हैं’, यह निश्चित ही पाठकों के ध्यान में आया होगा ! हम भी श्रद्धापूर्वकवर्क साधना करते रहे, तो क्या ईश्वर युद्धजन्य स्थिति में भी हमारे लिए दौडे चले नहीं आएंगे ? अतः आनेवाले आपातकाल में साधक बिना भय के श्रद्धापूर्वक साधना करें । – श्री. योगेश जलतारे
देश के मंदिरों के लिए एक स्वतंत्र ‘सनातन संरक्षण मंडल’ या समिति का गठन किया जाना चाहिए ! – Shankaracharya Sadanand Saraswati
योग शरीर को ४० वर्ष की आयु में २० वर्ष की आयु से भी अधिक लचीला बनाने में सहायक है ! – PM Narendra Modi
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
मुंबापुरी में सहस्रों के समष्टि संकल्प से राष्ट्ररक्षा हेतु प्राप्त हुआ आध्यात्मिक बल !
Bangladesh Hindus : पिछले ४ महीनों में १०० हत्याएं, २८ बलात्कार एवं ९५ मंदिरों में तोडफोड
संपादकीय : राष्ट्र के लिए त्याग करें !