यज्ञ करने के पीछे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी का व्यापक एवं उदार उद्देश्य !

वैदिक धर्मपरंपरा में यज्ञ केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, अपितु उसे समष्टि के कल्याण हेतु दिव्य साधना माना गया है । हमारे ऋषि-मुनियों ने यज्ञसंस्कृति के द्वारा विश्वकल्याण का मार्ग दिखाया । उस परंपरा को आगे बढाते हुए गुरुदेवजी ने अब तक विभिन्न यज्ञों का आयोजन किया है । इन यज्ञों के पीछे केवल व्यक्तिगत अथवा स्थानीय उद्देश्य नहीं है, अपितु साधकों की रक्षा एवं हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए आवश्यक आध्यात्मिक बल प्राप्त हो, यह अत्यंत व्यापक एवं उदार उद्देश्य है ।

‘यज्ञकुंड का भीतरी भाग श्वेत हो, तो ज्वालाओं के कारण काला हो जाने से अच्छा नहीं दिखता । इसलिए वह भाग मिट्टी से पोतें’, ऐसा पुरोहितों को बताते सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

१. सूक्ष्म मार्गदर्शन !

यज्ञपरंपरा केवल ग्रंथाधारित नहीं है, अपितु वह ऋषि-मुनियों के सजीव मार्गदर्शन से विकसित परंपरा है । जीवनाडी-पट्टिका के वाचन में समय-समय पर विभिन्न यज्ञ करने के लिए कहा गया तथा उन यज्ञों द्वारा हुए अनुभवों से प्राप्त परिणाम भी स्पष्ट हुए हैं ।

नाडीपट्टिका में स्थित लेखन के द्वारा सनातन संस्था के धर्मकार्य को मार्गदर्शन मिलना अत्यंत अमूल्य एवं दुर्लभ घटना है । सूक्ष्म मार्गदर्शन के कारण यज्ञों का स्वरूप, पद्धतियां एवं उनके उद्देश्य और अधिक स्पष्ट एवं प्रभावी होते हैं । उसके कारण यज्ञकार्य केवल कर्मकांड न रहकर दैवीय संकल्प पूर्ण करनेवाली साधना बन जाती है ।

२. निष्कर्ष

यज्ञ केवल कर्मकांडात्मक प्रक्रिया नहीं है, अपितु वह समष्टि उन्नति, साधकों की रक्षा एवं धर्मसंवर्धन की प्रभावी साधना है । गुरुदेवजी द्वारा संपन्न किए गए ये यज्ञ नाडीपट्टिका में किए गए उल्लेखों के अनुसार व्यापक हित के संकल्प से प्रेरित हैं तथा उनके द्वारा साधकों को आध्यात्मिक बल प्राप्त होकर धर्मकार्य और अधिक समर्थरूप से आगे बढ रहा है ।

– श्री. अमर जोशी, सनातन वेदपाठशाला

आश्रम में संपन्न यज्ञकार्य की व्याप्ति !

गुरुदेवजी के मार्गदर्शन में आश्रम में अब तक ५०० से अधिक यज्ञ संपन्न हुए हैं । उनमें विभिन्न देवताओं एवं तत्त्वों का आवाहन कर किए गए यज्ञ अंतर्भूत हैं, जैसे कि दशमहाविद्या यज्ञ, चंडी होम, वाराही होम, नरसिंह होम, इंद्राक्षी होम, हनुमान कवच यज्ञ, पंचमहाभूत यज्ञ इत्यादि इन सभी यज्ञों द्वारा सूक्ष्म स्तर पर व्यापक कार्य साध्य किया गया है ।

विश्वशांति हेतु संकल्प

श्री. अमर जोशी

प्रत्येक यज्ञ में संकल्प करते समय समष्टि कल्याण एवं विश्वशांति का प्रधानता से विचार किया जाता है । शास्त्र बताता है कि यज्ञ से उत्पन्न होनेवाली सात्त्विक ऊर्जा सूक्ष्म स्तर पर सर्वत्र प्रसारित होती है ।

यज्ञसंस्कृति का संरक्षण

वर्तमान काल में जहां यज्ञसंस्कृति लुप्त होती जा रही है, वहां इस प्रकार के यज्ञों द्वारा उसे पुनर्जीवित किया जाता है । इससे वेदाधारित अनुष्ठान, मंत्रों एवं आचार का संरक्षण होता है ।

साधकों को चैतन्य की प्राप्ति एवं आध्यात्मिक संरक्षण

जिस स्थान पर यज्ञ होता है, वहां के साधकों को उसके चैतन्य का लाभ मिलता है । यज्ञ से उत्पन्न होनेवाली सात्त्विक तरंगों से साधकों के आध्यात्मिक कष्ट अल्प होने में सहायता मिलती है ।

अनुभूतियों के कारण श्रद्धा में वृद्धि

यज्ञकाल में साधकों को विभिन्न आध्यात्मिक अनुभूतियां होती हैं । इसलिए उनकी श्रद्धा दृढ होकर साधना और भावपूर्ण होती है ।

स्थलशुद्धि एवं सात्त्विकता में वृद्धि

यज्ञ संपन्न किए गए स्थल की सूक्ष्म शुद्धि होकर वहां की सात्त्विकता बढती है, जिससे वहां का वातावरण और पवित्र व साधना के लिए अनुकूल बनता है ।

हविर्भाग के दीर्घकालीन परिणाम

यज्ञ के हविर्भाग के परिणाम दीर्घकालीन होते हैं । उससे वातावरण में सूक्ष्म संतुलन साधकर पर्जन्यवृद्धि जैसे परिणाम भी मिलते हैं । सोमयाग के द्वारा आनेवाले काल में वर्षा के लिए अनुकूलता होना, उसका उदाहरण है ।

– श्री. अमर जोशी, सनातन वेदपाठशाला

प.पू. रामभाऊस्वामीजी (१) और सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी (२)

तंजावुर, तमिलनाडु के प.पू. रामभाऊस्वामीजी ने जनवरी २०१६ में रामनाथी आश्रम में ‘उच्छिष्ट गणेशयाग’ संपन्न किया । उस समय स्वामीजी प्रज्वलित यज्ञकुंड में १० – १५ मिनट तक सहजता से लेटे हुए थे, तब भी उन्हें कोई हानि नहीं पहुंची । इस संदर्भ में  सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी ने सूक्ष्म परीक्षण कर बताया, ‘‘प.पू. रामभाऊस्वामीजी ने तेजतत्त्व पर प्रभुत्व प्राप्त किया है, इसलिए अग्नि उन्हें तथा उनके वस्त्रों को अधिक स्पर्श नहीं कर सकती ।’’


कालिदास उवाच (महाकवि कालिदास के अनुसार)

‘सर्वतीर्थात्मिके सर्वमंत्रात्मिके सर्वतंत्रात्मिके सर्वयंत्रात्मिके

सर्वपीठात्मिके सर्वतत्त्वात्मिके सर्वशक्त्यात्मिके सर्वविद्यात्मिके

सर्वयोगात्मिके सर्वनादात्मिके सर्वशब्दात्मिके सर्वविश्वात्मिके

सर्वदीक्षात्मिके सर्वसर्वात्मिके सर्वगे पाहि मां पाहि माम् ।।’

अर्थ एवं स्पष्टीकरण : मातंगी देवी सभी तीर्थ, सभी मंत्र, तंत्र, यंत्र, पीठ, सभी विद्याओं, शक्तियों, नाद, योगों एवं दीक्षाओं का स्रोत एवं आधार हैं ।

संक्षेप में बताना हो, तो वे सभी प्राणिमात्रों में एवं विश्व में सर्वव्यापी हैं ।

उक्त श्लोक इसका प्रमाण है कि मातंगी देवी साक्षात आदिपराशक्ति का अवतार हैं । संपूर्ण विश्व में भगवान रुद्र के अतिरिक्त (शिवजी के अतिरिक्त) ३ नेत्रोंवाली एवं सभी जीवों में सर्वव्यापी एकमात्र देवी हैं । वे ही आदिपराशक्ति हैं ।

  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।
  • इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक