वैदिक धर्मपरंपरा में यज्ञ केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, अपितु उसे समष्टि के कल्याण हेतु दिव्य साधना माना गया है । हमारे ऋषि-मुनियों ने यज्ञसंस्कृति के द्वारा विश्वकल्याण का मार्ग दिखाया । उस परंपरा को आगे बढाते हुए गुरुदेवजी ने अब तक विभिन्न यज्ञों का आयोजन किया है । इन यज्ञों के पीछे केवल व्यक्तिगत अथवा स्थानीय उद्देश्य नहीं है, अपितु साधकों की रक्षा एवं हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए आवश्यक आध्यात्मिक बल प्राप्त हो, यह अत्यंत व्यापक एवं उदार उद्देश्य है ।

१. सूक्ष्म मार्गदर्शन !
यज्ञपरंपरा केवल ग्रंथाधारित नहीं है, अपितु वह ऋषि-मुनियों के सजीव मार्गदर्शन से विकसित परंपरा है । जीवनाडी-पट्टिका के वाचन में समय-समय पर विभिन्न यज्ञ करने के लिए कहा गया तथा उन यज्ञों द्वारा हुए अनुभवों से प्राप्त परिणाम भी स्पष्ट हुए हैं ।
नाडीपट्टिका में स्थित लेखन के द्वारा सनातन संस्था के धर्मकार्य को मार्गदर्शन मिलना अत्यंत अमूल्य एवं दुर्लभ घटना है । सूक्ष्म मार्गदर्शन के कारण यज्ञों का स्वरूप, पद्धतियां एवं उनके उद्देश्य और अधिक स्पष्ट एवं प्रभावी होते हैं । उसके कारण यज्ञकार्य केवल कर्मकांड न रहकर दैवीय संकल्प पूर्ण करनेवाली साधना बन जाती है ।
२. निष्कर्ष
यज्ञ केवल कर्मकांडात्मक प्रक्रिया नहीं है, अपितु वह समष्टि उन्नति, साधकों की रक्षा एवं धर्मसंवर्धन की प्रभावी साधना है । गुरुदेवजी द्वारा संपन्न किए गए ये यज्ञ नाडीपट्टिका में किए गए उल्लेखों के अनुसार व्यापक हित के संकल्प से प्रेरित हैं तथा उनके द्वारा साधकों को आध्यात्मिक बल प्राप्त होकर धर्मकार्य और अधिक समर्थरूप से आगे बढ रहा है ।
– श्री. अमर जोशी, सनातन वेदपाठशाला

तंजावुर, तमिलनाडु के प.पू. रामभाऊस्वामीजी ने जनवरी २०१६ में रामनाथी आश्रम में ‘उच्छिष्ट गणेशयाग’ संपन्न किया । उस समय स्वामीजी प्रज्वलित यज्ञकुंड में १० – १५ मिनट तक सहजता से लेटे हुए थे, तब भी उन्हें कोई हानि नहीं पहुंची । इस संदर्भ में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी ने सूक्ष्म परीक्षण कर बताया, ‘‘प.पू. रामभाऊस्वामीजी ने तेजतत्त्व पर प्रभुत्व प्राप्त किया है, इसलिए अग्नि उन्हें तथा उनके वस्त्रों को अधिक स्पर्श नहीं कर सकती ।’’
कालिदास उवाच (महाकवि कालिदास के अनुसार)
‘सर्वतीर्थात्मिके सर्वमंत्रात्मिके सर्वतंत्रात्मिके सर्वयंत्रात्मिके
सर्वपीठात्मिके सर्वतत्त्वात्मिके सर्वशक्त्यात्मिके सर्वविद्यात्मिके
सर्वयोगात्मिके सर्वनादात्मिके सर्वशब्दात्मिके सर्वविश्वात्मिके
सर्वदीक्षात्मिके सर्वसर्वात्मिके सर्वगे पाहि मां पाहि माम् ।।’
अर्थ एवं स्पष्टीकरण : मातंगी देवी सभी तीर्थ, सभी मंत्र, तंत्र, यंत्र, पीठ, सभी विद्याओं, शक्तियों, नाद, योगों एवं दीक्षाओं का स्रोत एवं आधार हैं ।
संक्षेप में बताना हो, तो वे सभी प्राणिमात्रों में एवं विश्व में सर्वव्यापी हैं ।
उक्त श्लोक इसका प्रमाण है कि मातंगी देवी साक्षात आदिपराशक्ति का अवतार हैं । संपूर्ण विश्व में भगवान रुद्र के अतिरिक्त (शिवजी के अतिरिक्त) ३ नेत्रोंवाली एवं सभी जीवों में सर्वव्यापी एकमात्र देवी हैं । वे ही आदिपराशक्ति हैं ।


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