ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ।।
– गुरुगीता, अध्याय २, श्लोक १११
(स्कंदपुराण, उत्तरखंड, उमामहेश्वर संवाद)
अर्थ : ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले, परम सुख दाता, केवल ज्ञानस्वरूप, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से परे, आकाश के समान (निराकार), ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों का लक्ष्य (‘वह (ब्रह्म) तुम हो’, ऐसा वेदवाक्य जिनके लिए कहा गया है, वे), एकमात्र, नित्य, विमल (शुद्ध), अचल (स्थिर), सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी, भावातीत एवं त्रिगुणातीत सद्गुरु को मैं नमस्कार करता हूं ।
‘ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी’ अर्थात सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का जन्मोत्सव दिवस ! गुरुदेवजी का जन्मोत्सव साधकों के लिए अत्यंत चैतन्यमय, दैवी एवं अलौकिक आनंद प्रदान करनेवाला पर्व होता है । पूरे वर्ष साधक जिस स्वर्णिम क्षण की आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं, वह यही मंगलमय क्षण है ! सप्तर्षि द्वारा नाडीपट्टिका में किए उल्लेखानुसार अब तक प्रत्येक वर्ष गुरुदेव का जन्मोत्सव विभिन्न प्रकार से मनाया गया है । वर्ष २०२२ में रथोत्सव, वर्ष २०२३ में ब्रह्मोत्सव एवं वर्ष २०२५ में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’, इस प्रकार जन्मोत्सव का स्वरूप उत्तरोत्तर व्यापक होता गया । इन माध्यमों से हमने गुरुकार्य का भव्य-दिव्य रूप अनुभव किया; परंतु गुरुदेवजी का स्वरूप उससे भी अधिक व्यापक है तथा वही श्री गुरु का निर्गुण स्वरूप है। सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के वर्ष २०२६ के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में मैं उनके श्री चरणों में कोटिशः कृतज्ञतापूर्वक नमन कर उस निर्गुण गुरुतत्त्व के विषय में कुछ शब्दसुमन अर्पित कर रही हूं…

१. गुरु का निर्गुण एवं सर्वव्यापक स्वरूप !
साधना यात्रा में प्रारंभ में हम गुरु को मानवी देह में देखते हैं; परंतु जैसे-जैसे साधना हमारे अंतर्मन में दृढ होने लगती है, वैसे-वैसे हमें गुरु की व्यापकता समझ में आने लगती है । गुरु का वास्तविक स्वरूप केवल उनके मानवी अथवा सगुण देह तक सीमित नहीं होता । गुरु मूलतः एक ‘निर्गुण’ तत्त्व हैं । निर्गुण रूप में गुरु आकाश के समान अथाह, अनंत एवं सर्वव्यापी होते हैं । उन्हें स्थल, काल अथवा समय की कोई मर्यादा नहीं होती । हम जहां भी देखें, वहां गुरुतत्त्व विद्यमान है । चराचर में, कण-कण में तथा क्षण-क्षण में गुरु ही हैं ।
२. ‘श्री गुरुगीता’ में वर्णित गुरुमहिमा !
गुरु का यह अलौकिक स्वरूप एवं उनका अथाह माहात्म्य आदिगुरु भगवान शिव ने श्री गुरुगीता के एक श्लोक में अत्यंत सुंदर रूप से पिरोया है –
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ।। – गुरुगीता, अध्याय २, श्लोक १११
(स्कंदपुराण, उत्तरखंड, उमामहेश्वर संवाद)
(यह श्लोक अर्थ सहित प्रारंभ में प्रकाशित किया गया है ।)
३. उपर्युक्त श्लोक के प्रत्येक शब्द से पूर्णतः मेल खानेवाली सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी की महिमा !

इस श्लोक का प्रत्येक शब्द गुरुतत्त्व के महान रहस्य को प्रकट करता है । ‘इसका प्रत्येक शब्द सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी पर किस प्रकार पूर्णतः लागू होता है ?’, यह आगे दिया गया है ।
३ अ. ब्रह्मानन्दं : ईश्वर अनादि हैं तथा वे स्थल, काल तथा देह से परे हैं । वे निरंतर सत्-चित्-आनंद स्वरूप हैं । ब्रह्मस्थिति आनंदमय होती है । सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी अवतारी गुरु होने के कारण मानवी देह में रहते हुए भी निरंतर ब्रह्मानंद में निमग्न रहते हैं । वे साक्षात ईश्वरस्वरूप होने से उनकी भी ‘अनादि स्थिति’ है ।
३ आ. परमसुखदं : सांसारिक सुख क्षणभंगुर व दुःखयुक्त होते हैं; परंतु गुरु ‘परमसुखद’ हैं । परम अर्थात सर्वोच्च ! साधकों को कभी समाप्त न होनेवाला ‘परम सुख’, अर्थात शाश्वत आनंद प्रदान करने के लिए ही गुरुदेवजी ने ‘आनंदप्राप्ति हेतु साधना’ सिखाई है । इसके माध्यम से वे स्वयं आनंदी रहते हुए साधकों को भी उसी परमानंद की चोटी तक पहुंचा रहे हैं । वे स्वयं आनंदमय स्थिति में हैं, इसीलिए वे साधकों को आनंद प्रदान करते हैं ।
३ इ. केवलं ज्ञानमूर्तिं : वास्तविक ज्ञान मन एवं बुद्धि से परे होता है । अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त एवं अहं) के दोष दूर कर गुणों से परे जाना ही निर्गुण अवस्था है । गुरुदेवजी ने यह निर्गुण अवस्था प्राप्त की है तथा उनके मन एवं बुद्धि क्रमशः विश्वमन व विश्वबुद्धि से एकरूप हो चुके हैं; इसलिए उन्हें सभी प्रकार का ज्ञान है । वर्ष १९८६ से वे ‘अध्यात्मशास्त्र संबंधी ज्ञान का संकलन अथवा ग्रंथलेखन’ का कार्य निरंतर कर रहे हैं । ‘ग्रंथों के ज्ञान से जिज्ञासुओं व साधकों की शंकाओं का समाधान हो तथा उनकी साधना को गति मिले एवं भावी पीढियों को भी इस ज्ञान का लाभ हो’, यही उनका उद्देश्य है । अत: ‘ज्ञानमूर्ति’ उपाधि उन्हें पूर्णतः शोभायमान है । साधकों को ज्ञान एवं परमानंद, दोनों प्रदान करनेवाले वे महान युगप्रवर्तक गुरु हैं ।
३ ई. द्वन्द्वातीतं : ‘परब्रह्म का वर्णन करते समय वेद भी यह कहकर थक जाते हैं ‘नेति नेति’ (‘यह नहीं, यह भी नहीं’ अथवा ‘इतना नहीं, केवल इतना ही नहीं’) । यह जैसे त्रिवार सत्य है, वैसे ही यह भी सत्य है कि गुरुदेवजी की आध्यात्मिक स्थिति इतनी उच्च है कि हम अपनी सीमित मानवी बुद्धि से उन्हें पूर्णतः कभी समझ ही नहीं सकते । ‘उनका यह अगाध स्वरूप हमारी समझ की सीमा से परे है’, इसमें कोई भी द्वंद्व (दूजाभाव अथवा विरोधाभास) नहीं है ।
३ उ. गगनसदृशं : जिस प्रकार आकाश निराकार है, उसका पार नहीं पाया जा सकता और वह सर्वव्यापी है, उसी प्रकार गुरुदेवजी का स्वरूप विशाल एवं सर्वव्यापी है । इसलिए सनातन के साधक विश्व के किसी भी भाग में हों, वे आकाश के समान श्री गुरु की कृपाछाया का अखंड अनुभव करते रहते हैं ।

३ ऊ. तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् : ‘तत्त्वमसि (वह ब्रह्म तुम ही हो)’, ऐसा वेदवाक्य जिनके लिए कहा गया है, वे गुरु ! गुरुदेवजी परब्रह्म के सगुण एवं निर्गुण, दोनों स्वरूप हैं । गुरुदेवजी जैसे आकाश के समान व्यापक हैं, वैसे ही वे सूक्ष्मातिसूक्ष्म भी हैं । इसलिए गुरुदेवजी के संदर्भ में कहना उचित लगता है, ‘तत्त्वमसि’ !
३ ए. एकं नित्यं विमलमचलं : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी सदैव सत्-चित्-आनंद अवस्था में रहते हैं । इसलिए उन्हें अपने स्थूलदेह का भान नहीं रहता । उन्हें केवल चैतन्य का अनुभव होता है । ‘देहबुद्धि’ नष्ट हो जाने के कारण उन्हें विमल (परम शुद्ध) अवस्था प्राप्त हुई है । जैसे परमेश्वर का स्थान अटल है, उसी प्रकार गुरुदेवजी का स्थान भी अटल है । उनके समान कोई दूसरा नहीं हो सकता । इसलिए वे एकमेवाद्वितीय हैं ।
३ ऐ. सर्वधीसाक्षिभूतं : गुरुदेवजी में बढते निर्गुण तत्त्व के कारण उनमें व्यापकता आई है । सर्वत्र तत्त्वरूप में वे ही व्याप्त हैं, इसलिए उनका अपना कुछ भी शेष नहीं रहा । परिणामस्वरूप गुरुदेवजी को अपने ‘स्व’ के संदर्भ में अनुभव होनेवाली संवेदनाएं न्यून हो गई हैं । इसका एक उदाहरण यह है कि वर्ष २०१७ में एक बार गुरुदेवजी ने कहा था, ‘‘कक्ष में रहते हुए भी मैं ऐसा अनुभव करता हूं मानो ‘मैं किसी दूसरे के घर अथवा किसी उपाहारगृह (होटल) के कक्ष में रह रहा हूं ।’ ‘वह मेरा कक्ष है’, ऐसा मुझे नहीं लगता । इसी प्रकार कपडे, चप्पल आदि सभी के संदर्भ में विचार आता है । इतना ही नहीं, ‘यह शरीर भी मेरा नहीं है’, ऐसा विचार आता है । इन विचारों के कारण ‘इदं न मम ।’, अर्थात ‘यह मेरा नहीं है’, इस संस्कृत वचन को, जिसे मैं पहले बुद्धि से समझने का प्रयास करता था, उसकी सार्थकता अब मैं अनुभव कर रहा हूं । इससे ‘माया से चरणबद्ध रूप में कैसे मुक्त हुआ जा सकता है ?’, यह भी मुझे अनुभव हो रहा है ।’’
इससे ‘गुरुदेवजी अपनी देह को भी कितने साक्षीभाव से देखते हैं तथा वे जो निर्गुण स्थिति अनुभव कर रहे हैं, वह कितने उच्च स्तर की है !’, इसका अनुभव होता है ।
३ ओ. भावातीतं त्रिगुणरहितं : त्रिगुणातीत अवस्था को प्राप्त जीव अपने तथा अन्यों के संदर्भ में होनेवाली घटनाओं को साक्षीभाव से देखता है । ‘साक्षीभाव’ ही उसका स्थायीभाव बन जाने के कारण, वह संपूर्ण जीवन ईश्वरेच्छा से व्यतीत करता है । सच्चिदानंद परब्रह्म
डॉ. आठवलेजी त्रिगुणातीत अवस्था को प्राप्त हैं । वे अखंड शिवात्मा दशा में रहकर मोक्षावस्था का अखंड अनुभव करते हैं । त्रिगुणातीत अवस्था के कारण प.पू. भक्तराज महाराजजी की भजनपंक्ति ‘भाव नहीं, न भावना ही ।’, के अनुसार उनकी भावातीत अवस्था हो चुकी है ।
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ
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