सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
‘कहां माता-पिता को निरुपयोगी मानकर वृद्ध आश्रम में भेजनेवाली पश्चिमी विचारधारा की वर्तमान पीढी और कहां ‘यह पूरा विश्व ही मेरा घर है’, ऐसा सिखानेवाली हिन्दू धर्म की अभी तक की पीढियां !’
‘कहां माता-पिता को निरुपयोगी मानकर वृद्ध आश्रम में भेजनेवाली पश्चिमी विचारधारा की वर्तमान पीढी और कहां ‘यह पूरा विश्व ही मेरा घर है’, ऐसा सिखानेवाली हिन्दू धर्म की अभी तक की पीढियां !’
श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी की विशेषता यह है कि वे ‘आज्ञापालन’, इस गुण से ओतप्रोत हैं, साथ ही उन्होंने ‘लगन’, ’साधकों के प्रति निरपेक्ष प्रीति, कार्यमग्नता एवं ईश्वर के साथ आंतरिक सान्निध्य’, इन गुणों के द्वारा साधकों की साधना के दायित्व का बडी सहजता से निर्वहन किया तथा आज भी कर रही हैं
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की अनेक उपलब्धियां केवल साधक ही नहीं, अपितु समाज के महनीय व्यक्ति भी अचंभित होकर देख रहे हैं । ३० वर्षों की अल्पावधि में इतना विशाल कार्य केवल अवतारी व्यक्ति ही कर सकते हैं !
ईश्वर के द्वारा वैकुंठ में किए शंखनाद का स्थूल परिणाम पृथ्वी पर वर्ष २०२५ की श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से लेकर वर्ष २०२६ की श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तक घटित होनेवाली कुछ वैश्विक घटनाओं के माध्यम से दिखाई देगा ।
‘ध्वनिप्रदूषण, जलप्रदूषण, वायुप्रदूषण आदि से संबंधित सदैव समाचार आते हैं; परंतु धर्म शिक्षा के अभाव में उनकी जड़ रज-तम के प्रदूषण की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता !’