फल-ज्योतिषशास्त्र के मूलभूत घटक : ग्रह, राशि एवं कुंडली के स्थान

फल-ज्योतिषशास्त्र ग्रह, राशि एवं कुंडली के स्थान, इन ३ मूलभूत घटकों पर आधारित है । इन ३ घटकों से भविष्य का निर्धारण करना संभव होता है । इन ३ घटकों को संक्षेप में इस लेख द्वारा समझ लेते हैं ।     

सनातन के दिव्य ग्रंथों के लिए अनुवादकों की आवश्यकता !

जो भी सनातन के दिव्य ग्रंथों का अनुवाद मराठी/हिन्दी/अंग्रेजी से गुजराती/कन्नड/मलयालम/तमिल/तेलुगु तथा मराठी से अंग्रेजी में करने के इच्छुक हैं, कृपया संपर्क करें ।

धार्मिक चिन्हों से प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदनों का अध्ययन करें ! – शॉन क्लार्क, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय

‘प्रत्येक चिन्ह से सूक्ष्म सकारात्मक अथवा नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते रहते हैं । अधिकतर धार्मिक नेता उनके धार्मिक चिन्हों से प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदनों की ओर ध्यान नहीं देते तथा उसका प्रतिकूल परिणाम उनके अनुयायियों एवं भक्तों पर हो सकता है ।

आज का काल रज-तमप्रधान होने के कारण प्रसाद स्वरूप प्राप्त वस्तुओं की शुद्धि करने के उपरांत ही उनका उपयोग करना उचित !

देवालय में श्रद्धालु भगवान का भक्तिभाव से दर्शन करते हैं । देवालय के पुजारी कभी-कभी प्रसाद के रूप में कुछ वस्तुएं देते हैं, उदा. भगवान को अर्पण की गई मालाएं, वस्त्र इत्यादि । भगवान को अर्पित वस्तुओं में चैतन्य होता है ।

देवालय में परिक्रमा करने से व्यक्ति को होनेवाले आध्यात्मिक स्तर के लाभ !

देवालय के गर्भगृह में विद्यमान चैतन्य गर्भगृह में एवं गर्भगृह के आसपास वर्तुलाकार घूमता रहता है । परिक्रमा करने से परिक्रमा करनेवाले को इस चैतन्य का लाभ मिलता है ।

शाश्वत आनंदप्राप्ति हेतु साधना तथा स्वभावदोष-निर्मूलन आवश्यक है ! – कु. मिल्की अग्रवाल, गोवा

शोध का निष्कर्ष बताते हुए कु. मिल्की अग्रवाल ने कहा कि ‘‘कोई अध्यात्मशास्त्र के अनुसार सत्यनिष्ठा से साधना करे, तो कुछ समय के उपरांत उसके जीवन के दु:ख तथा तनाव घटते हैं तथा उस व्यक्ति को शांति एवं आनंदप्राप्ति में सहायता होती है ।’’

‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ के अंतर्गत ‘वास्तुओं की सात्त्विकता का अध्ययन’, इससे संबंधित शोधकार्य में सम्मिलित हों !

वर्तमान काल में समाज में वास्तुशास्त्र बहुत ही प्रचलित है । प्रत्येक व्यक्ति को लगता है कि अपना घर वास्तुशास्त्र के अनुसार होना चाहिए । घर में वास्तुदोष हों, तो वहां निवास करनेवालों पर उसके विपरीत परिणाम होते हैं ।

अध्यात्म का महत्त्व वैज्ञानिक शोधों से भी सिद्ध हो चुका है ! – शॉन क्लार्क

परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी के मार्गदर्शन में महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय द्वारा आध्यात्मिक विषयों का विशिष्टतापूर्ण वैज्ञानिक शोध किया जाता है । ‘यूनिवर्सल ऑरा’ एवं ‘एनर्जी स्कैनर’ जैसे उपकरणों की सहायता से किया हुआ यह शोध प्राचीन भारतीय शिक्षा के अनुरूप है ।

‘दोनों हथेलियों की एकत्रित मुद्रा’ कर शरीर पर से कष्टदायक शक्ति का आवरण निकालने की पद्धति !

गुरुकृपा से ही शरीर पर से आवरण निकालने की इन पद्धतियों को ढूंढ पाए । इसके लिए हम साधक श्री गुरु के श्रीचरणों में कृतज्ञता व्यक्त करते हैं ।

विविध कलाओं में प्रवीण विद्यार्थियों को अध्यात्म एवं कला एक-दूसरे से जोडकर साधना कैसे करनी है, यह सिखानेवाला महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय !

‘संगीत वर्ग में अथवा रेडियो पर वार्तालाप के माध्यम से अनके लोगों तक महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के शोधकार्य का विषय पहुंचा है । आगे विविध गुरुकुल, इन्स्टिट्यूट, एकेडमी में भी यह इसी प्रकार पहुंचेगा और यह विषय समझने पर उनमें से जो जिज्ञासु होंगे, उन्हें इस विषय का महत्त्व समझ में आएगा