पू. भगवंत कुमार मेनरायजी के पार्थिव शरीर से प्रचुर मात्रा में चैतन्य प्रक्षेपित होना तथा उनके अंतिम दर्शन करनेवाले साधकों को आध्यात्मिक लाभ होना

‘संतों के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक दृष्टि से क्या लाभ होता है ?’, इसके संदर्भ में महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय की ओर से ‘यू.ए.एस. (यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर)’ उपकरण तथा लोलक के द्वारा शोध किया गया ।

सनातन के ३ गुरुओं द्वारा ब्रह्मोत्सव में धारण किए वस्त्राभूषणों में विलक्षण चैतन्य उत्पन्न होना !

ब्रह्मोत्सव से पूर्व वस्त्राभूषणों में १.५ से ३.३ सहस्र मीटर तक सकारात्मक ऊर्जा थी । परात्पर गुरु डॉक्टरजी के द्वारा ब्रह्मोत्सव में इन वस्त्राभूषणों को धारण किए जाने के उपरांत उनमें विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा ४२ सहस्र से लेकर १ लख मीटर से भी अधिक हुई ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के द्वारा महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के अंतर्गत आरंभ किए गए ‘संगीत के माध्यम से साधना’, इस संकल्प का उत्तरोत्तर बढता हुआ कार्य !

वर्ष २०१७ में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मोत्सव के समय उन्होंने बताया था, ‘आज महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के अंतर्गत संगीत के माध्यम से साधना करने हेतु ‘संगीत से संबंधित कार्य आरंभ किया गया है ।’ उनके इस संकल्प के कारण ही यह कार्य अल्पावधि में बढता गया तथा प्रतिदिन बढता ही जा रहा है ।

‘भगवान भाव के भूखे होते हैं’, इस वचन के अनुसार मंदिर में देवता के दर्शन करते समय दर्शन कर रहे व्यक्ति का भगवान के प्रति भाव के अनुसार उसे चैतन्य ग्रहण होता है !

‘व्यक्ति के द्वारा मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने से पूर्व तथा करने के उपरांत उसकी सूक्ष्म ऊर्जा पर (‘ऑरा’ पर) क्या परिणाम होता है ?’, वैज्ञानिक दृष्टि से इसका अध्ययन करने हेतु एक परीक्षण किया गया । इस परीक्षण के लिए ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’, उपकरण का उपयोग किया गया ।

ब्रह्मोत्सव में महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय की साधिकाओं द्वारा नृत्य के माध्यम से साकारित मनोहारी विष्णुलीला !

श्रीविष्णुरूप सहित इस वर्ष की नृत्य-आराधना की विशेषता थी बालकृष्ण एवं यशोदा मैया की सुंदर लीलाएं ! साधिकाओं ने इतनी तन्मयता से वो लीलाएं साकार कीं कि कार्यस्थल पर मानो गोकुल अवतरित हुआ । 

जिनकी आध्यात्मिक सीख के कारण सहस्रों लोगों का जीवन की ओर देखने का दृष्टिकोण परिवर्तित होता है, वे परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी ! – पू. डॉ. राजकुमार केतकर, प्रसिद्ध कथक नृत्याचार्य, ठाणे, महाराष्ट्र.

महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के शोध केंद्र में इस आध्यात्मिक सीख का प्रभाव मुझे दिखाई दिया । सहस्राें जिज्ञासु वहां आते हैं और वहां की सात्त्विकता के कारण उन सहस्रों लोगों का जीवन की ओर देखने का दृष्टिकोण परिवर्तित होता है । परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी वहां की शक्ति हैं ।

वास्तुदोष निवारण हेतु संपन्न किए गए रत्नसंस्कार अनुष्ठान से संबंधित शोधकार्य !

रत्नसंस्कार अनुष्ठान करने से वास्तु पर सकारात्मक परिणाम होते हैं, यह इस शोध से प्रमाणित हुआ । इस शोध के अंतर्गत किए गए परीक्षणों में प्राप्त निरीक्षणों का विवेचन इस लेख में दिया गया है

‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ के अंतर्गत हाथ-पैरों के तलुवों पर स्थित रेखाओं से संबंधित शोधकार्य में सम्मिलित होकर साधना के स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाएं ! 

साधक, पाठक, शुभचिंतक एवं धर्मप्रेमियों का हस्त-पाद सामुद्रिक शास्त्र के विषय में अध्ययन हो, तो वे इस कार्य में सम्मिलित हो सकते हैं ।

श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ, साथ ही श्रीराम का नामजप करना आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक; परंतु स्तोत्रपाठ की तुलना में नामजप का परिणाम अधिक

‘श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करना तथा श्रीराम का नामजप करना तथा करनेवाले पर उसका क्या परिणाम होता है ?’, इसका विज्ञान द्वारा अध्ययन करने हेतु ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ द्वारा से परीक्षण किए गए ।

धूप के उपचार करने से (शरीर पर धूप लेने से) व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ होना !

‘आज के समय में अधिकतर लोगों को अल्पाधिक स्तर पर आध्यात्मिक कष्ट (टिप्पणी) होता है, साथ ही वातावरण में रज-तम का स्तर बहुत बढ जाने से व्यक्ति की देह, मन एवं बुद्धि पर कष्टदायक स्पंदनों का आवरण बतनता है ।