
‘साधना में शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होने के लिए साधकों में ‘प्रामाणिकता’ यह मूलभूत गुण होना अनिवार्य है । कुछ साधकों द्वारा ‘स्वयं की चूकें उत्तरदायी साधक, तथा सहसाधकों से छुपाना अथवा असंदिग्धता से बताना, उनसे झूठ बोलना; जो प्रयास हुए हैं, उसके संदर्भ में उन्हें बताना, परंतु जो प्रयास नहीं हुए हैं, उनका उल्लेख भी न करना’ इत्यादि अनुचित कृत्य स्वयं की प्रतिमा को दरार न पडे; इसलिए केवल समय पसार करने के लिए किए जाते हैं । इस प्रकार के अप्रामाणिकता के कृत्यों से साधना में वेग से नीचे गिरकर अधोगति होती है ।
ईश्वर का हमारे प्रत्येक कृत्य की ओर ध्यान रहता है । ‘जो पापी स्वयं का पाप सारे विश्व को चीखकर बताता है, वही महात्मा बनने की योग्यता का होता है’, यह दृष्टिकोण रखकर साधकों द्वारा प्रयास होना अपेक्षित है । यदि अप्रामाणिकता की चूकें होती हैं, तो साधकों को ‘प्रतिमा संजोना’ इस अहं के पहलू पर मात कर स्वयं की चूकें सहसाधक, साथ ही उत्तरदायी साधक को प्रामाणिकता से बताकर क्षमायाचना करें । ‘हमारे द्वारा हुई चूकों के संदर्भ में समय रहते प्रायश्चित लेना, यदि परिवर्तन नहीं होता, तो दंडपद्धति का अवलंबन करना’ इत्यादि प्रयास करने से उनका (पापों का) क्षालन होगा । स्वयं की चूकें प्रस्तुत करने में यदि तनाव आता है, तो साधक ‘प्रसंग का अभ्यास करना, चूक फलक पर लिखकर तदनंतर बैठक में प्रस्तुत करना, स्वसूचना सत्र करना’, इस प्रकार प्रयास करें ।’
साधको, ‘सत्यनिष्ठा’ का गुण, अर्थात ईश्वरप्राप्ति के मार्ग का प्रथम चरण है’, यह ध्यान रखकर वह गुण आत्मसात करने के लिए प्रयास करें !’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (१.३.२०२३)
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