शिव को दुग्धाभिषेक करने का महत्त्व !
शिव को दूध का अभिषेक करें; इसका कारण दूध में शिव का तत्त्व आकर्षित करने की क्षमता अधिक होने से दूध के अभिषेक के माध्यम से शिव का तत्त्व अधिक जागृत होता । इसके कारण दूध तीर्थ के रूप में प्राशन करने से शिवतत्त्व का अधिक लाभ होता है ।
शिवजी को श्वेत रंग के फूल चढाएं !
विशिष्ट फूलों में विशिष्ट देवता का तत्त्व आकर्षित करने की क्षमता अन्य फूलों की तुलना में अधिक होती है । धतूरा, श्वेत कमल, श्वेत कनेर, चमेली, मदार, नागचंपा, पुन्नाग, नागकेसर, रजनीगंधा, जाही, जूही, मोगरा तथा श्वेत पुष्प शिवजी को चढाएं । इन फूलों की सुगंध के कारण शिव का तत्त्व पिंडी में अधिक मात्रा में आकर्षित होता है और देवता के तत्त्व का लाभ हमें प्राप्त होता है । देवता के चरणों में फूलों को विशिष्ट संख्या में अर्पित करने से उन फूलों में उस देवता का तत्त्व जल्दी आकर्षित होता है । इस सिद्धांत के अनुसार, शिव को १० फूल अर्पित करें ।
शिव के तारक एवं मारक तत्त्व के लिए उपयोगी अगरबत्ती !
शिव की पूजा करते समय, यदि शिव के तारक तत्व को अधिक मात्रा में आकर्षित करना हो, तो केवडा अथवा चमेली के कोई सुगंध की अगरबत्ती का उपयोग करें, यदि शिवजी के मारक तत्त्व अधिक मात्रा में आकर्षित करना हो, तो हीना अथवा दरबार इन सुगंध की अगरबत्ती का उपयोग करें ।
शिव को बेल चढाएं
जिन वस्तुओं में किसी विशेष देवता का पवित्र तत्त्व आकर्षित करने की क्षमता अन्य वस्तुओं के तुलना में अधिक होती है, यदि ऐसी वस्तु देवताओं को चढाएं, तो देवता का तत्त्व मूर्तियों में आकर देवता की मूर्ति के चैतन्य का लाभ हमें जल्दी मिलता है । इसलिए शिव को बेल चढाएं ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान शिवकी उपासनाका अध्यात्मशास्त्र’)
भगवान शिव की उपासना का अध्यात्मशास्त्र !
शृंगदर्शन का महत्त्व !
श्री गुरुचरित्र के अनुसार शृंगदर्शन करते समय नंदीजी के पिछले पैरों की ओर बैठकर अथवा खडे रहकर बायां हाथ नंदी के वृषण पर रखें । उसके उपरांत दाहिने हाथ की तर्जनी अर्थात अंगूठे के निकट की उंगली तथा अंगूठा नंदी के सींग पर रखें । दोनों सींग तथा उनपर रखी गई दोनों उंगलियों के मध्य की रिक्ति से शिवजी के दर्शन करें ।
नंदी के वृषण को हाथ लगाने का अर्थ है ‘कामवासना पर नियंत्रण रखना’ । सींग अहंकार, पुरुषत्व एवं क्रोध का प्रतीक है । सींग को लगाने का अर्थ है अहंकार, पुरुषत्व एवं क्रोध पर नियंत्रण रखना । शिवजी के मंदिर में प्रवेश करने के उपरांत आरंभ में नंदीजी के दर्शन करने से हममें भी नंदीजी की भांति लीनता उत्पन्न होती है तथा इसी लीनता के साथ शृंगदर्शन करना लाभदायक सिद्ध होता है ।
महाशिवरात्रि (दिनांक : २६.२.२०२५) : व्रत की विधि
महाशिवरात्रि के एक दिन पहले अर्थात फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी पर एकभुक्त रहें । चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल व्रत का संकल्प करें । सायंकाल नदी अथवा तालाब पर जाकर शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । प्रदोषकाल में शिवजी के मन्दिर जाएं । शिवजी का ध्यान करें । तदुपरान्त षोडशोपचार पूजा करें । भवभवानी प्रीत्यर्थ (यहां भव अर्थात शिव) तर्पण करें । शिवजी को एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र अर्पित करें । पुष्पांजलि अर्पित कर, अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ तथा मूलमंत्र का जाप हो जाए, तो शिवजी के मस्तक पर चढाए गए फूल लेकर अपने मस्तक पर रखें और शिवजी से क्षमायाचना करें । महाशिवरात्रि को हर एवं हरि एक होते हैं; इसलिए इस दिन शिवजी को तुलसी एवं श्रीविष्णु को बेल चढाते हैैं ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान शिव की उपासना का अध्यात्मशास्त्र’)
शिवलिंग की अर्धपरिक्रमा करने का धर्मशास्त्रीय आधार !
शिवजी की परिक्रमा चन्द्रकला के समान अर्थात सोमसूत्री होती है । ‘चंद्र अर्थात ‘सोम’ एवं ‘सूत्र’ अर्थात ‘नाला’ । अरघा से उत्तर दिशा की ओर, अर्थात सोम की दिशा की ओर, मंदिर के आंगन के कोने तक जो सूत्र अर्थात नाला जाता है, उसे सोमसूत्र कहते हैं । परिक्रमा अपनी बाईं ओर से आरंभ करें एवं जलप्रणालिका के दूसरी छोर तक जाएं । अब उसे लांघे बिना मुडें एवं पुनः जलप्रणालिका आकर परिक्रमा पूर्ण करें । यह नियम केवल मानव-स्थापित अथवा मानव-निर्मित शिवलिंग पर ही लागू होता है; स्वयंभू लिंग अथवा चल (पूजा घर के) लिंग पर नहीं । अरघा के स्रोत को लांघते नहीं, क्योंकि वहां शक्तिस्रोत होता है । उसे लांघते समय पैर फैलते हैं तथा वीर्यनिर्मिति एवं पांच अन्तस्थ वायुओं पर विपरीत परिणाम होता है । देवदत्त एवं धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट उत्पन्न हो जाती है । लांघते समय यदि स्वयं को संकुचित कर लें, अर्थात नाडियों को भींच लें, तो नाडियों पर दुष्परिणाम नहीं होता ।
बुद्धिजीवी समझते हैं कि प्रणालिका लांघते समय उसमें पैरों की गंदगी गिरने से, उस जल को तीर्थ मानकर प्राशन करनेवाले श्रद्धालुओं को रोग हो सकता है; इसलिए प्रणालिका नहीं लांघते !
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान शिव की उपासना का अध्यात्मशास्त्र’)