गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के अमूल्य विचार !

‘राष्ट्र एवं धर्म के प्रति अभिमान न रखनेवाली जनता उसी प्रकार के जनप्रतिनिधियों को चुनती है । उसके कारण आज देश पतन के रसातल को पहुंच गया है । इसका एक ही उपाय है – हिन्दुओं में राष्ट्र-धर्म के प्रति अभिमान जागृत कर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना !

हिन्दी पाक्षिक ‘सनातन प्रभात’ की आज २३ वीं वर्षगांठ के निमित्त सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का संदेश

‘सनातन प्रभात’ के ज्ञानशक्ति का परिपूर्ण लाभ लें ! :    ‘सनातन प्रभात’ ने प्रारंभ से ही आदर्श राष्ट्ररचना के लिए अराजकीय विचार, राष्ट्र-धर्म हित के दृष्टिकोण और ज्वलंत हिन्दुत्व की भूमिका के माध्यम से वैचारिक क्रांति का संदेश दिया है । अनेकों ने ‘सनातन प्रभात’ के वैचारिक संदेश पर आचरण कर राष्ट्र-धर्म रक्षा का कार्य भी किया है ।

महर्षिजी द्वारा बताए अनुसार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी का ५५ वां जन्मदिवस !

कोटि-कोटि प्रणाम !

१७ सितंबर : जोधपुर, राजस्थान की सनातन की ६३ वीं संत पू. (श्रीमती) सुशीला मोदीजी का ७२ वां जन्मदिवस !

कोटि-कोटि प्रणाम !

नववर्षारंभ दिन का संदेश

हिन्दुओ, चैत्र प्रतिपदा इस ‘युगादि तिथि’ को नववर्ष के प्रारंभ के रूप में मान्यता मिलने के लिए शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और राजनैतिक प्रयासों की पराकाष्ठा कीजिए और भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित कीजिए !

राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निभाकर राष्ट्राभिमानी बनें !

हमारे राष्ट्र के तेजस्वी इतिहास और श्रेष्ठतम संस्कृति को हम समझ लेंगे, तो हममें हमारे राष्ट्र के प्रति अभिमान जागृत होगा । राष्ट्र के प्रति अभिमान होगा, मन में राष्ट्रप्रेम होगा, तो राष्ट्र के प्रतीकों के प्रति भी हमारे मन में आदर रहेगा ।

‘भारतीय भाषा, वेष और विचारों की पुनर्स्थापना से ही देश स्वतंत्र एवं स्थिर हो सकेगा’, यह संदेश देने के लिए यह गणतंत्र दिवस आया है ।

हमारे राष्ट्रपुरुषों के आत्मसमर्पण के मूल में सनातन धर्म की प्रेरणा थी । उसका विस्मरण होने के कारण क्या हम एक राष्ट्र बनकर रह सकते हैं ? आज गणतंत्र दिवस निमित्त यही प्रश्न हमारे सामने है ।

भारतीयो, २६ जनवरी के ध्वजारोहण के पश्चात जगह-जगह बिखरे ध्वजों की अवमानना से बचने का हम संकल्प करें और ध्वज का गौरव कर अपनी देशभक्ति प्रमाणित करें !

हमारा जन्म इस पवित्र भारत देश में हुआ, क्या वह केवल खान-पान के लिए और ‘मैं एवं मेरा परिवार’, ऐसा संकीर्ण विचार करने के लिए है ? यदि यह देश मेरा घर है, तो धर्म अर्थात मेरे घर के ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ परिजन हैं ! यदि ये दोंनो नहीं, तो आपका जीवन कैसा रहेगा ?