ग्रंथवाचन एवं ग्रंथों के लिए चिन्हित कतरनों से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का ध्यान में आया ईश्वरत्व !

अनेक लोगों को उनके द्वारा पढे गए लेखन से महत्त्वपूर्ण सूत्रों को अलग निकालकर रखने की तथा कतरनों को संदर्भ के रूप में संजोकर रखने की आदत होती है । उससे उनके गुण भी प्रकट होते हैं; परंतु इससे केवल ईश्वर ही अन्यों को अनुभूति दे सकते हैं । इस सेवा के माध्यम से अन्यों में गुणवृद्धि करनेवाले तथा उन्हें चैतन्य प्रदान करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमात्र हैं ।

कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तियोग के क्रम में हुई परम पूज्य डॉक्टरजी की आध्यात्मिक यात्रा

‘मैंने वर्ष १९८२ तक सम्मोहन उपचार विशेषज्ञ के रूप में व्यवसाय और शोध किया । वर्ष १९८३ से १९८६ के दौरान विभिन्न संतों के पास जाने पर अध्यात्म, संत, यह सब सत्य है, इसका मुझे विश्वास हो गया ।

भूतल पर सर्वश्रेष्ठ जन्म अर्थात हिन्दू धर्म में जन्म मिलना ! -सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

‘इस भूतल पर ‘हिन्दू धर्म में जन्म मिलना’ श्रेष्ठ है तथा उसमें भी इस जन्म में अध्यात्म एवं साधना में रुचि होना सर्वश्रेष्ठ है !’

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा वर्ष १९८१ में सम्मोहन उपचार संबंधी अवधारणाओं के विषय में किया गया लेखन

‘पैरेनॉइड सिजोफ्रेनिया’ मनोरोग के सम्मोहन चिकित्सा से ठीक होने की कारणमीमांसा

हिन्दुओ, कालानुसार साधना के रूप में श्रीरामरक्षा स्तोत्र और हनुमान चालीसा का प्रतिदिन पाठ करें !

‘हिन्दुओ, आपातकाल निकट आता जा रहा है । इस काल में श्रीराम और हनुमान के आशीर्वाद से हम पार हो सकते हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

‘मानव का जन्म क्यों हुआ ? जन्म के पूर्व वह कहां था ? मृत्यु के उपरांत वह कहां जाएगा ? इत्यादि विषयों की थोडी-बहुत भी जानकारी न रखनेवाले पश्चिमी तथा साम्यवादी क्या कभी मानवजाति की समस्याएं दूर कर पाएंगे ?

साधना करने से ‘एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय ।’ की अनुभूति ली जा सकती है !  

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा अनुभव किया गया श्री गुरु का महत्त्व !

जिज्ञासुओ, अध्यात्म के संदर्भ में केवल बौद्धिक जानकारी प्राप्त करने में समय व्यर्थ न कर प्रत्यक्ष साधना करें !

अध्यात्म के संदर्भ में जिज्ञासा रखनेवाले अनेक लोग उससे संबंधित पुस्तकें पढने, प्रवचन सुनने आदि माध्यमों से केवल बौद्धिक स्तर की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

कहां लगभग ३५०० वर्ष पूर्व ही निर्मित हुए विविध धर्म (पंथ), और कहां अनादि अनंत सनातन धर्म !

संपत्काल (शांतिकाल) से युद्धकाल की ओर सीमोल्लंघन करें !

‘विजयादशमी सीमोल्लंघन करने का दिन है ! ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने शत्रु सीमा में सीमोल्लंघन कर यह सिद्ध कर दिया है कि ‘भारतीय सेना शत्रु राष्ट्र पर विजय प्राप्त करने में सक्षम है ।’