चैत्र प्रतिपदा इस ‘युगादि तिथि’ को नववर्ष के आरंभ के रूप में मान्यता मिलने के लिए ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित करें !

‘चैत्र प्रतिपदा यह युगादि तिथि है । ‘युग’ और ‘आदि’ इन शब्दों की संधि से ‘युगादि’ शब्द बना है । इस दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की निर्मिति की थी । सृष्टि का प्रारंभ दिन अर्थात कालगणना का प्रथम दिन चैत्र प्रतिपदा है, तब भी आज भारत में १ जनवरी सर्वत्र नववर्ष के आरंभ के रूप में मनाया जाता है । यह स्वतंत्र भारत का सांस्कृतिक पराभव है । युगादि तिथि का अनादित्व ध्यान में रखकर तथा सांस्कृतिक पराभव का इतिहास परिवर्तित करने के लिए चैत्र प्रतिपदा इस ‘युगादि तिथि’ को नववर्ष के आरंभ के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए । इसके लिए संवैधानिक दृष्टि से भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित होना अनिवार्य है ।
भारत के पुरुषार्थी सम्राटों ने ‘युगादि तिथि’ का महत्त्व समझकर इसी दिन से ‘विक्रम संवत् (उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने प्रारंभ की हुई कालगणना)’, ‘शालिवाहन शक (इसवी सन के ७८ वें वर्ष पर शालिवाहन राजा द्वारा प्रारंभ की गई कालगणना)’, ‘युधिष्ठिर संवत’ (युधिष्ठिर राजा द्वारा प्रारंभ की गई कालगणना) आदि कालगणना आरंभ कीं । उनकी पराक्रमी स्मृतियों का स्मरण करने का यह समय है । हिन्दुओ, चैत्र प्रतिपदा इस ‘युगादि तिथि’ को नववर्ष के प्रारंभ के रूप में मान्यता मिलने के लिए शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और राजनैतिक प्रयासों की पराकाष्ठा कीजिए और भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित कीजिए !’
– (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था.
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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