तिथि : ‘प्रदेशानुसार फाल्गुनी पूर्णिमा से पंचमी तक पांच-छः दिनों में, कहीं दो दिन, तो कहीं पांचों दिन यह त्योहार मनाया जाता है ।

उत्सव मनाने की पद्धति
१. स्थान एवं समय : किसी देवालय के सामने अथवा सुविधाजनक स्थान पर सायंकाल में होली जलानी होती है । अधिकतर किसी गांव के ग्रामदेवता के सामने होली खडी की जाती है ।
२. कृति : बीच में एरंड, माड, सुपारी अथवा गन्ना खडा करते हैं । उसके चारों ओर उपलों एवं लकडियों की रचना करते हैं । प्रथम कर्ता शूचिर्भूत होकर एवं देशकाल का उच्चारण कर संकल्प करे – ‘सकुटुम्बस्य मम ढुण्ढाराक्षसीप्रीत्यर्थं तत्पीडापरिहारार्थं होलिकापूजनमहं करिष्ये ।’ तदुपरांत ‘होलिकायै नमः ।’ मंत्र बोलते हुए होली जलाएं । होली जलने पर उसकी परिक्रमा करें और उलटे हाथ से शंखध्वनि करें, अर्थात चिल्लाएं । होली के पूर्ण जलने पर, दूध एवं घी छिडककर उसे शांत करें एवं तदुपरांत इकट्ठा हुए लोगों में नारियल, पपनस (चकोतरा) जैसे फल बांटें । सारी रात नृत्यगायन में व्यतीत करें ।
दूसरे दिन प्रात:काल होली की राख को वंदन करें । यह राख शरीर को लगाकर स्नान करें, जिससे आधि-व्याधि की पीडा नहीं होती । (आधी अर्थात मानसिक व्यथा अथवा चिंता एवं व्याधि अर्थात (शारीरिक) रोग ।) सवेरे अश्लील शब्दों का उच्चारण कर होली की धूलि विसर्जित करें । उसके उपरांत होली से प्रार्थना करें ।
अश्लील उच्चारण करने का अर्थ
१. ‘यह विधि मनकी दुष्ट प्रवृत्तिको शांत करने के लिए है ।
२. फाल्गुन पूर्णिमा पर पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र आता है । इस नक्षत्र की देवी ‘भग’ है, जिसका प्रचलित अर्थ है जननेंद्रिय, अर्थात स्त्री की इंद्रिय । तब भग का उल्लेख कर चिल्लाना, एक प्रकार की पूजा ही है । इसे देवी का सम्मान ही समझें । कुछ स्थानों पर राख एवं गोबर, कीचड जैसे पदार्थ शरीर पर लीपकर नृत्यगायन करने की प्रथा है ।’
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘धार्मिक उत्सव एवं व्रतों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’)
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