साधना करने के कारण जीवन के कठिनतम प्रसंगों में भी व्यक्ति स्थिर रहकर उसका सामना कर सकता है ! – पू. नीलेश सिंगबाळजी, हिन्दू जनजागृति समिति

अहं खेत में उगनेवाले खरपतवार जैसा है, जिसे पूर्णतया नष्‍ट किए बिना ईश्‍वर कृपा की फसल नहीं उगती । इसलिए निरंतर इसकी कटाई करते रहना चाहिए । इसके साथ ही साथ ईश्‍वर के प्रति भाव होना भी अत्‍यंत महत्त्वपूर्ण है ।

महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित कार्यशाला में जिज्ञासुओं के लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का मार्गदर्शन

परात्‍पर गुरु डॉक्‍टरजी ‘स्‍पिरिच्‍युअल साइन्‍स रिसर्च फाउंडेशन’ संस्‍था के प्रेरणास्रोत हैं । पूरे विश्‍व में अध्‍यात्‍मप्रसार करने हेतु उन्‍होंने ‘महर्षि अध्‍यात्‍म विश्‍वविद्यालय’ की स्‍थापना की है ।

सनातन संस्‍था के हितचिंतक श्री. सचिन कपिल के पिताजी की मृत्‍यु के उपरांत तेरहवीं के दिन पर ‘ऑनलाइन साधना सत्‍संग’ का आयोजन !

मृत्‍यु के उपरांत पूर्वजों की अतृप्‍त आत्‍मा को सद़्‍गति मिलने के लिए हमें क्‍या प्रयास करने चाहिए, पूर्वजों से होनेवाले कष्‍ट निवारण हेतु भगवान दत्तात्रेय के नामजप का महत्त्व, साधना और कालानुसार नामजप का महत्त्व आदि विषयों पर हिन्‍दू जनजागृति समिति के प्रवक्‍ता श्री. नरेंद्र सुर्वे ने अपने विचार प्रस्‍तुत किए ।

चेन्‍नई के पट्टाभिराम प्रभाकरन् (आयु ७६ वर्ष) सनातन के १०५ वें व्‍यष्‍टि संत पद पर विराजमान !

नम्रता, अल्‍प अहं तथा वृद्धावस्‍था में भी भावपूर्ण सेवा करनेवाले सनातन के साधक श्री. पट्टाभिरामन् प्रभाकरन् सनातन के १०५ वें व्‍यष्‍टि संत पद पर विराजमान हुए ।

सनातन के गुरु-शिष्‍य संबंधी ग्रंथ पढें !

शिष्‍य को केवल गुरुकृपा से ही मोक्ष प्राप्‍त हो सकता है ! – ग्रंथ – गुरुका महत्त्व, प्रकार एवं गुरुमन्‍त्र
ग्रंथ – गुरुका शिष्‍योंको सिखाना एवं गुरु-शिष्‍य सम्‍बन्‍ध

संत भक्‍तराज महाराज जैसे पूर्णता को प्राप्‍त उच्‍च कोटि के संतों के सत्‍संग से लाभान्‍वित पू. शिवाजी वटकरजी द्वारा वर्णन की गई गुरुतत्त्व की महिमा !

परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी हमें अभ्‍यासवर्ग में अध्‍यात्‍म का सैद्धांतिक ज्ञान देते थे और उसका प्रत्‍यक्ष क्रियान्‍वयन करने के लिए बताकर साधना करवाते थे । उसके प्रायोगिक भाग के रूप में वे हमें संतों का सत्‍संग कराते थे, साथ ही हमसे राष्‍ट्र एवं धर्म के संदर्भ में सेवा भी करवाते थे ।

तीव्र शारीरिक कष्ट से पीडित होते हुए भी अंतिम श्वास तक गुरुकार्य की तीव्र लगन रखनेवाले ६७ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के मथुरा के स्व. विनय वर्मा !

विनय भैया जब आश्रम में थे, तब उन्होंने सभी साधकों से निकटता बना ली थी । साधकों की चर्चा में कभी भी विनय भैया का विषय हो, तो साधक उनके स्मरण से आनंदित होते थे ।भैया को तीव्र शारीरिक कष्ट होते समय तथा अत्यधिक वेदना होते हुए भी वे कभी उस संबंध में नहीं बताते थे ।

दीपावली पर्व पर देवता-तत्त्व आकृष्‍ट एवं प्रक्षेपित करनेवाली रंगोलियां बनाना !

‘सनातन हिन्‍दू संस्‍कृति में रंगोली का अपना एक अलग ही महत्त्व है । उसके मूल में शुद्ध शास्‍त्रीय दृष्‍टिकोण है । रंगोली, देवता-तत्त्व आकृष्‍ट करनेवाली सात्त्विक आकृतियों की सहायता से बनाने पर, वहां संबंधित देवता के तत्त्व भी आकृष्‍ट होते हैं ।

‘स्वयं की प्रकृति के अनुरूप काल के अनुसार देवता का ‘तारक’ अथवा ‘मारक’ नामजप करें एवं नामजप से मिलनेवाले लाभ में वृद्धि करें !

देवता की विविध उपासना-पद्धतियों में कलियुग की सबसे सरल उपासना है ‘देवता का नामजप करना’ । देवता के प्रति मन में बहुत भाव उत्‍पन्‍न होने के उपरांत देवता का नाम कैसे भी लिया गया, तो चलता है; परंतु सामान्‍य साधक में इतना भाव नहीं होता ।

दिल्ली में नवरात्रि के अवसर पर ऑनलाइन प्रवचन

देहली – सनातन संस्‍था एवं हिन्‍दू जनजागृति समिति द्वारा नवरात्रि के अवसर पर एक ऑनलाइन साधना सत्‍संग का आयोजन किया गया । सत्‍संग में श्रीमती माला कुमार ने नवरात्रि का महत्त्व, उपासना के बारे में बताया ।