साधकों को स्वभावदोष एवं अहं के निर्मूलन की प्रक्रिया सिखाकर स्वसूचनाओं के द्वारा स्वभावदोषों पर विजय प्राप्त करने का मार्गदर्शन करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी !

मेरे मन पर बचपन में घटित कुछ प्रसंगों का परिणाम हुआ था, इसलिए मेरे मन में असुरक्षा की सुप्त भावना थी । सनातन संस्था के मार्गदर्शन में साधना आरंभ करने पर प्रत्येक प्रसंग में प.पू. डॉक्टरजी ने (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी ने) मुझे सदैव आधार देकर उन प्रसंगों से मुझे संवारा ।

साधको, शब्दशक्ति के माध्यम से संदेह फैलाने हेतु सक्रिय सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियों की चाल पहचानकर साधना बढाओ !

वर्तमान में सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियां साधकों की श्रद्धा को भंग कर उन्हें साधना से दूर करने के लिए ‘शब्दशक्ति’ के माध्यम से बडे स्तर पर सूक्ष्म युद्ध कर रही हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की विभिन्न कृतियों से प्रक्षेपित स्पंदनों का अध्ययन

‘मनुष्य की विभिन्न कृतियां प्रधानता से सत्त्वगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी होती हैं । उन गुणों के अनुसार संबंधित कृति से स्पंदन प्रक्षेपित होते रहते हैं । ‘उच्च आध्यात्मिक स्तर के अर्थात ‘परात्पर गुरु’ स्तर के संतों के संदर्भ में यह कैसे होता है ?’, इसका अध्ययन किया गया ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के माथे पर अंकित कमल सुस्पष्टता से दिखाई देने का कारण !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के माथे पर अंकित कमल सुस्पष्ट दिखाई देने का क्या कारण है ? वर्ष २०११ एवं वर्ष २०१२ की अवधि में उस कमल की ४ पंखुडियां अस्पष्ट दिखाई देती थीं तथा वर्ष २०१३ में वे सुस्पष्ट दिखाई देने लगी । ‘कमल का सुस्पष्ट होना’ क्या दर्शाता है ?

‘श्री गुरु पर श्रद्धा’, यही भवसागर से पार होने की एकमात्र गुरुकुंजी !

ऐसे महान अवतारी गुरु के श्री चरणों में साधकों की श्रद्धा कैसी होनी चाहिए ? गुरु के अस्तित्व अथवा उनके कार्य पर तनिक भी संदेह न करते हुए, ‘मेरे गुरु जो कर रहे हैं, वह मेरे कल्याण के लिए ही है’, ऐसा दृढ भाव मन में रखना ही श्रद्धा है ।

‘जहां जाऊं मैं, वहां गुरुदेवजी आप ही हैं !’

इस लेखमाला में ‘ईश्वर साधकों का कैसे ध्यान रखते हैं ?’, इससे संबंधित प्रसंग दे रहे हैं । इससे ‘जहां जाऊं, वहां आप मेरे सहयात्री !’, यह संतवचन कितना सार्थ है, यह ध्यान में आएगा ।

साधको, आनेवाले आपातकाल का सामना करने के लिए श्रद्धा के बल पर साधना में आनेवाली बाधाओं पर विजय प्राप्त करो !

वर्तमान में संपूर्ण विश्व आपातकाल की सीमा पर खड़ा है। युद्ध, प्राकृतिक आपदाएं, कोरोना जैसी महामारी आदि विभिन्न माध्यमों से आपातकाल कभी भी आ सकता है। आज तक ईश्वर ने हमारी साधना होने के लिए इस काल को रोककर रखा है; परंतु वह आज न कल आनेवाला ही है

साधको, शब्दशक्ति के माध्यम से संदेह फैलाने हेतु सक्रिय सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियों की चाल पहचानकर साधना बढाओ !

वर्तमान में सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियां साधकों की श्रद्धा को भंग कर उन्हें साधना से दूर करने के लिए ‘शब्दशक्ति’ के माध्यम से बडे स्तर पर सूक्ष्म युद्ध कर रही हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ‘इदं न मम ।’, इस लेखन का अध्यात्मशास्त्रीय विश्लेषण !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजीे की अहंरहित अवस्था के कारण उनके द्वारा ज्ञानकार्य का श्रेय साधकों को दिया जाना 

ग्रंथवाचन एवं ग्रंथों के लिए चिन्हित कतरनों से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का ध्यान में आया ईश्वरत्व !

अनेक लोगों को उनके द्वारा पढे गए लेखन से महत्त्वपूर्ण सूत्रों को अलग निकालकर रखने की तथा कतरनों को संदर्भ के रूप में संजोकर रखने की आदत होती है । उससे उनके गुण भी प्रकट होते हैं; परंतु इससे केवल ईश्वर ही अन्यों को अनुभूति दे सकते हैं । इस सेवा के माध्यम से अन्यों में गुणवृद्धि करनेवाले तथा उन्हें चैतन्य प्रदान करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमात्र हैं ।