परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों की शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति हेतु ‘गुरुकृपायोग’ साधनामार्ग की निर्मिति

कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग इत्यादि जिस किसी भी मार्ग से साधना करें, तब भी ईश्वरप्राप्ति हेतु गुरुकृपा के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है । शीघ्र गुरुप्राप्ति हेतु तथा गुरुकृपा निरंतर होने हेतु परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने ‘गुरुकृपायोग’ नामक सरल साधनामार्ग बताया है ।

सात्त्विकता एवं चैतन्यशक्ति से युक्त ‘परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी का छायाचित्रमय जीवनदर्शन’ ग्रंथ !

छायाचित्रमय जीवनदर्शन ग्रंथ के ‘यू.ए.एस.’ परीक्षण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल ४८६ मीटर पाया गया !

श्रीविष्णु के अवतार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के जन्मोत्सव के दिन पंढरपुर से रामनाथी आश्रम में लाई कुछ वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई जाना तथा उसी दिन पंढरपुर के श्री विठ्ठल मंदिर के तहखाने में श्रीविष्णु बालाजी की मूर्ति मिलना

इस घटना के माध्यम से मानो साक्षात भगवान ही यह बता रहे हैं, ‘सनातन संस्था के साधकों को प्राप्त मोक्षगुरु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी प्रत्यक्ष श्रीमन्नारायणस्वरूप ही हैं । वे ही श्रीविष्णु के अवतार हैं ।

मेरे द्वारा अनुभव किए गए, अत्यधिक गुणवान एवं अन्यों को अपने समान बनानेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी !

प.पू. डॉक्टरजी मेरे जीवन में आए और मुझे जीवन का ध्येय समझ में आया तथा उनकी कृपा से मुझे वहां साधना एवं सेवा करने का अवसर मिला । मेरी साधना के प्रारंभिक काल में उन्होंने मुझे व्यवहार एवं साधना की प्रत्यक्ष सीख प्रदान कर तैयार किया ।

‘चरित्रसंपन्न राष्ट्र’ ही आदर्श राष्ट्र है !

‘अश्लील चलचित्र’, ‘पब’, ‘लिव इन रिलेशनशिप’ जैसी बातों को शासनकर्ताओं ने मान्यता दी । इससे राष्ट्र की जनता का चरित्र नष्ट हो रहा है । ‘रामराज्य’ और छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘हिन्दवी स्वराज्य’ आदर्श था; क्योंकि वे राज्य चरित्रसंपन्न थे । वर्तमान शासनकर्ता यह ध्यान में रखकर ‘चरित्रसंपन्न राष्ट्र’ निर्माण करने का प्रयास करेंगे क्या ? भावी हिन्दू राष्ट्र (सनातन धर्म राज्य) चरित्रसंपन्न ही होगा ।’

हिन्दू राष्‍ट्र में ‘स्‍वभाषाभिमान रखना’ धर्म ही होगा !

हिन्दुओं का स्‍वभाषाप्रेम सहित राष्‍ट्र और धर्म प्रेम भी नष्‍ट होता जा रहा है । शासकों के इस राष्‍ट्रीय पाप को ईश्वर क्षमा नहीं करेंगे । भावी हिन्दू राष्‍ट्र में (सनातन धर्म राज्‍य में) ‘स्‍वभाषाभिमान रखना’, धर्म ही होगा !’

बुद्धिवादी, सर्वधर्मसमभावी, साम्यवादी ही देश और धर्म के खरे शत्रु हैं !

‘बुद्धिवादियों के कारण हिन्दुओं की ईश्वर के प्रति श्रद्धा नष्ट हो गई । सर्वधर्मसमभाववादियों के कारण हिन्दू धर्म की अद्वितीयता हिन्दू समझ नहीं पाए एवं साम्यवादियों के कारण हिन्दुओं ने ईश्वर को मानना छोड़ दिया । अतः ईश्वर की कृपा न होने से हिन्दुओं और भारत की स्थिति दयनीय हो गई है । हिन्दू राष्ट्र की स्थापना ही इस पर एकमात्र उपाय है !’

अहंभाव रखनेवाले लेखापरीक्षक और अहंभावशून्य ईश्वर

‘लेखापरीक्षक कुछ व्यक्तियों का लेखा परीक्षण करते हैं तथा उसका उन्हें अहंभाव होता है । इसके विपरीत ईश्वर अनंत कोटि ब्रह्मांड के प्रत्येक जीव के प्रत्येक क्षण का लेखा जोखा (अकाउंट) रखते हैं, तब भी वे अहंशून्य हैं !’

अहंभाव रखनेवाले आधुनिक चिकित्सक (डॉक्टर) और अहंभावशून्य ईश्वर !

‘आधुनिक चिकित्सक (डॉक्टर) रोगियों को छोटे-बडे रोगों से बचाते हैं एवं उसका उन्हें अहंभाव होता है । इसके विपरीत ईश्वर साधकों को भवरोग से, अर्थात जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करते हैं, तब भी वे अहंशून्य होते हैं !’

क्या विज्ञान किसी एक क्षेत्र में भी धर्मशास्त्र के आगे है ? – खगोलशास्त्र

विज्ञान अलग अलग ग्रह-तारों का  आकार, पृथ्वी से उनकी दूरी आदि जानकारी बताता है, तो ज्योतिषशास्त्र ग्रह-तारों का परिणाम और परिणाम बुरा होनेवाला हो, तो उस पर उपाय भी बताता है ।’