सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की ८३ वीं जयंती (इस वर्ष १९ मई २०२५) के अवसर पर गोवा में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ का आयोजन किया है । इस उपलक्ष्य में उनके जीवन चरित्र के विषय में यह लेखमाला आरंभ कर रहे हैं । इस लेख में हम उनके जन्म, परिवार एवं शिक्षा, नौकरी के विषय में जानकारी प्राप्त करेंगे ।

१. सात्त्विक परिवार में जन्म एवं शिक्षा
१ अ. जन्म : ‘भगवद्भक्त के घर, जन्म लेते हैं उन्नत नर’, इस उक्ति के अनुसार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी (गुरुदेवजी) का जन्म ६ मई १९४२ (शक संवत अनुसार वैशाख कृष्ण सप्तमी, सवेरे ९.३६, कलियुग वर्ष ५०४४) को श्री. बाळाजी वासुदेव आठवलेजी एवं श्रीमती नलिनी बाळाजी आठवलेजी के यहां हुआ । आगे उन्होंने भी संतपद प्राप्त किया ।
नागोठणे (तालुका रोहा, जनपद रायगड) के स्व. गणेश जनार्दन वर्तक (डॉ. जयंत आठवलेजी के नानाजी) के घर में चिरंजीव जयंत का जन्म हुआ ।

ती. दादा गिरगांव (मुंबई) के ‘आर्यन हायस्कूल’में शिक्षक के रूप में नौकरी करते थे ।
१ आ. सात्त्विक कुटुंबीय
१ आ १. साधना के संस्कार करनेवाले आदर्श माता-पिता ! : ‘पू. दादा (पिता) एवं पू. श्रीमती ताई (मां) ने बचपन से ही हम पांचों भाईयों पर सात्त्विकता एवं साधना के संस्कार किए, जिसके कारण हम साधनारत हुए । पिताजी ने अध्यात्म सबंधी लेखन का विपुल संग्रह किया था । इस लेखन के आधार पर मैंने ५ ग्रन्थ प्रकाशित किए ।
मुझमें जो गुण हैं, वे मैंने प्रयत्नपूर्वक निर्माण नहीं किए । अधिकांश गुण पू. दादा और पू. श्रीमती ताई से अनुवांशिकता तथा उनके द्वारा मुझपर किए संस्कारों के कारण मुझमें निर्माण हुए हैं । अन्य अनेक गुण अधिकांशतः चारों भाईयों से मिले हैं । अधिकतर लोगों को लगता है कि ‘पैतृक संपत्ति’ का अर्थ है – घर, पैसा इत्यादि । हम भाईयों के सन्दर्भ में पैतृक संपत्ति है – ‘माता-पिता से मिले संस्कार और साधना में रुचि ।’ व्यावहारिक वस्तुओं की अपेक्षा यह संपत्ति अनमोल है । यह संपत्ति केवल हमारे लिए ही नहीं, साधकों की आगामी अनेक पीढियों के लिए उपयुक्त होगी । मुझे जन्म देने के लिए मैं माता-पिता के प्रति अत्यंत कृतज्ञ हूं ।’
– (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले (१२.९.२०१४)

१ आ २. उच्चविद्याविभूषित होकर भी आध्यात्मिक उन्नति करनेवाले सभी बन्धु ! : मेरे ज्येष्ठ बंधु एवं विख्यात बालरोग विशेषज्ञ वैद्याचार्य सद्गुरु डॉ. वसंत आठवलेजी ने भी साधना कर संतपद प्राप्त किया था । उन्होंने अभिभावकों के लिए उपयुक्त १६, आयुर्वेद सबंधी ३३ एवं मेरे संदर्भ में १, ऐसे कुल ५० ग्रंथ लिखे । मेरे द्वितीय ज्येष्ठ बंधु श्री. अनंत आठवलेजी (अभियंता) ने जून २०१९ में संतपद प्राप्त किया । उन्होंने ‘गीताज्ञानदर्शन’ एवं ‘अध्यात्मशास्त्र के विविध अंगों का बोध’ यह २ ग्रंथ लिखे । चौथे क्रमांक के बंधु स्व. डॉ. सुहास आठवले व्यष्टि साधना करते थे । वे सज्जनता की सगुण मूर्ति थे । उनका आध्यात्मिक स्तर ६५ प्रतिशत था । सबसे छोटे बंधु डॉ. विलास आठवलेजी का आध्यात्मिक स्तर भी ६५ प्रतिशत है । डॉ. विलास भी हरिद्वार के प.पू. देवानंदस्वामीजी के कार्य में सहभागी रहते हैं ।
मेरे द्वितीय क्रमांक के बंधु श्री. अनंत (पू. भाऊ) उस समय मुंबई में न होन के कारण उन्हें छोडकर परिवार के अन्य सभी सदस्यों को संत भक्तराज महाराजजी ने गुरुमंत्र दिया ।
(‘एक ही परिवार के सभी भाईयों ने अध्यात्म में उन्नति करना’, यह वर्तमान कलियुग में अत्यंत दुर्लभ है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी के सभी भाई उच्चविद्याविभूषित होते हुए भी उन्होंने व्यवहार में रहकर साधना की; इतना ही नहीं, अध्यात्म में अच्छी प्रगति भी की । इन पांच भाईयों का विचार करने पर भगवान के भक्त रहे पांच पाण्डवों का स्मरण हुए बिना नहीं रहता ।’ – संकलनकर्ता)
– (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले (१२.९.२०१४)
विद्यालयीन जीवन : बुद्धिमान और बहुमुखी प्रतिभा के धनी
पहली से दसवीं तक कक्षा में पहला क्रमांक !
ग्यारहवीं (मैट्रिक) की परीक्षा में लगभग १ लाख विद्यार्थियों में गुणवत्ता सूची में ३७ वां क्रमांक !
सातवीं में माध्यमिक गुणवत्ता छात्रवृत्ति !
विद्यालय की पत्रिका ‘आर्य’ के सम्पादक (विद्यार्थी प्रतिनिधि) के रूप में वर्ष १९५६ से १९५७ तक सक्रिय ।
महाविद्यालयीन शिक्षा एवं विद्यार्थी संगठनों में क्रियाशीलता
महाविद्यालयीन शिक्षा
जयंत की विज्ञान शाखा के पहले वर्ष की शिक्षा वर्ष १९५९ में मुंबई के ‘विल्सन महाविद्यालय’ में तथा द्वितीय वर्ष की शिक्षा वर्ष १९६० में ‘जय हिन्द महाविद्यालय’ में हुई ।
चिकित्सकीय शिक्षा
वर्ष १९६१ से १९६४ की कालावधि में ग्रैंट मेडिकल कॉलेज, मुंबई में चिकित्सकीय शिक्षा ली । वर्ष १९६४ में महाविद्यालय के ‘ग्रैंट मेडिकल कॉलेज मैगजीन’ के हिन्दी विभाग के सम्पादक के रूप में कार्यरत थे ।