‘हमारे यहां घर-घर सायंकाल में भगवान के सामने दीप प्रज्वलित करने के उपरांत ‘शुभं करोति’ सहित श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने की परिपाटी है। रामरक्षास्तोत्र की रचना बुधकौशिक ऋषि ने की है। आत्मज्ञानसंपन्न ऋषि-मुनियों तथा साधु-संतों को यह वाङ्मय परावाणी से स्फुरित होता है। इस अवस्था में ईश्वर से उनका संपूर्ण अद्वैत होने के कारण तथा ईश्वर ही सभी गतिविधियों के कर्ता-धर्ता हैं, इस अनुभूति के कारण बुधकौषिक ऋषि द्वारा लिखा हुआ पाया जाता है कि ‘शिवजी ने स्वप्नावस्था में रामरक्षा बताई।’
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी स्वयं के स्वास्थ्य-लाभ हेतु एक संत के बताए अनुसार प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करते हैं। ‘श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी पर क्या परिणाम होता है ?’, इसका अध्ययन करने हेतु एक परीक्षण किया गया। इस परीक्षण में तुलना के लिए एक साधक द्वारा श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने से उसपर क्या परिणाम होता है ?’, इसका भी अध्ययन किया गया। इन शोधजन्य परीक्षणों के लिए ‘यू.ए.एस. (यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर)’ उपकरण का तथा लोलक (पेंडुलम) का उपयोग किया गया। ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ एवं लोलक (पेंडुलम) की सहायता से वस्तु, वास्तु एवं व्यक्ति में समाहित सकारात्मक एवं नकारात्मक ऊर्जा की गणना की जा सकती है।
टिप्पणी : ‘यू.ए.एस.’ उपकरण की सहायता से प्रभामंडल की गणना करने हेतु परीक्षण-स्थल पर अधिक से अधिक ३० मीटर भूमि ही उपलब्ध थी। अतः प्रभामंडल की गणना करने हेतु लोलक (पेंडुलम) का उपयोग किया गया।
१. परीक्षण में प्राप्त प्रविष्टियों का विवेचन
प्रयोग के पहले दिन (२६.१०.२०२४ को) सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी ने उनके कक्ष में श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ किया। प्रयोग के दूसरे दिन (२७.१०.२०२४ को) एक साधक ने आश्रम के ध्यानमंदिर में श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ किया। श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने से पूर्व तथा पाठ करने के उपरांत दोनों का (छायाचित्रों का) ‘यू.ए.एस.’ उपकरण से परीक्षण किया गया। ‘संत एवं साधक द्वारा श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने पर श्रीराम के चित्र में, साथ ही चित्र के सामने प्रज्वलित की गई उदबत्ती (अगरबत्ती) की विभूति पर क्या परिणाम होता है ?’, इसका भी अध्ययन किया गया। प्रयोग के दोनों दिन श्रीराम के उसी चित्र का उपयोग किया गया था। इसमें श्रीराम का चित्र तथा उदबत्ती (अगरबत्ती) की विभूति का (छायाचित्रों का) भी परीक्षण किया गया।

१ अ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी तथा एक साधक, दोनों पर भी श्रीरामरक्षास्तोत्र के पाठ का सकारात्मक परिणाम होना : श्रीरामरक्षस्तोत्र का पाठ करने से पूर्व साधक में ४.७ मीटर नकारात्मक ऊर्जा थी; परंतु पाठ करने के उपरांत वह नष्ट हो गई। सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी एवं परीक्षण के अन्य घटकों में नकारात्मक ऊर्जा नहीं दिखाई दी। इन परीक्षणों में की गई सकारात्मक ऊर्जा की प्रविष्टियां आगे दी गई हैं –
उक्त प्रविष्टियों से निम्न सूत्र ध्यान में आए –
१. साधक द्वारा श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ किए जाने पर श्रीराम के चित्र में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा में ३० मीटर तक वृद्धि हुई। उस स्थान की विभूति में ४४ मीटर सकारात्मक ऊर्जा दिखाई दी। श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने के उपरांत साधक में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा में ९.६ मीटर तक वृद्धि हुई।
२. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने पर श्रीराम के चित्र में विद्यमान ४३३ मीटर तक वृद्धि हुई। उस स्थान की विभूति में ३९४ मीटर सकारात्मक ऊर्जा दिखाई दी। श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने के उपरांत सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल आश्चर्यजनक रूप से २० सहस्र मीटर अधिक हो गया।

२. परीक्षणों का निष्कर्ष
इससे यह समझ में आता है कि सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी तथा एक साधक, इन दोनों के ही द्वारा श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने पर उन्हें आध्यात्मिक स्तर के लाभ हुए; परंतु उनका स्तर भिन्न है। साथ ही इन दोनों ने भले ही एक ही चित्र के सामने यह पाठ किया हो, तब भी उस चित्र से प्रक्षेपित श्रीरामतत्त्व का (चैतन्य का) स्तर भिन्न है।

३. परीक्षणों में की गई प्रविष्टियों का अध्यात्मशास्त्रीय विश्लेषण

३ अ. श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने पर साधक के सर्व ओर सुरक्षा-कवच तैयार होना : श्रीरामरक्षास्तोत्र के पाठ के कारण विशिष्ट शक्ति (चैतन्य) उत्पन्न होती है। उसके कारण स्तोत्र का पाठ करनेवाले के सर्व ओर सुरक्षा-कवच तैयार होता है। साधक ने भावपूर्ण पद्धति से श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ किया। उसके कारण श्रीराम के चित्र में विद्यमान चैतन्य कार्यरत होकर साधक के सर्व ओर सुरक्षा-कवच तैयार हुआ। साधक द्वारा आश्रम के ध्यानमंदिर में पाठ किए जाने से उसपर वहां की सात्त्विकता का भी सकारात्मक परिणाम हुआ। इसके कारण साधक में विद्यमान नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होकर उसमें सकारात्मक ऊर्जा बढी। विभूति पर श्रीराम के चित्र से प्रक्षेपित चैतन्य का सकारात्मक परिणाम हुआ। उसके कारण विभूति में भी बहुत सकारात्मक ऊर्जा दिखाई दी। इससे देवताओं के स्तोत्र का भावपूर्ण पाठ करने का महत्त्व स्पष्ट होता है।
३ आ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ किए जाने पर उनमें विद्यमान समष्टि भाव के कारण समष्टि के कल्याण हेतु श्रीराम के चित्र में विद्यमान देवतातत्त्व कार्यरत होना : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी अति उच्च स्तर के समष्टि संत हैं। उनके द्वारा की जानेवाली कोई भी कृति समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए ही होती है। सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी द्वारा श्रीराम के चित्र के सामने पाठ करने पर उस चित्र में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा ३० मीटर से ४६३ मीटर तक बढी। सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी के समष्टि भाव के कारण श्रीराम के चित्र में विद्यमान देवतातत्त्व जागृत होकर वह समष्टि हेतु कार्यरत हुआ। साधक ने दूसरे दिन भी जब उसी चित्र के सामने पाठ किया, तब उस चित्र में विद्यमान चैतन्य केवल उस साधक तक सीमित रहकर ही कार्यरत हुआ। उसके कारण चित्र में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा ७० मीटर से बढकर १०५ मीटर तक पहुंची। सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी ने उनके कार्य के अनुरूप श्रीरामतत्त्व (चैतन्य) ग्रहण किया। उसके कारण सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा में बडे स्तर पर वृद्धि दिखाई दी । विभूति पर श्रीराम के चित्र में कार्यरत चैतन्य का सकारात्मक परिणाम हुआ । उसके कारण विभूति में बडे स्तर पर सकारात्मक ऊर्जा दिखाई दी । इससे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जैसे समष्टि संतों की प्रत्येक कृति समष्टि के कल्याण के लिए ही होती है, यह ध्यान में आता है ।’
– श्रीमती मधुरा धनंजय कर्वे, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा (३०.११.२०२४)
ई-मेल : mav.research2014@gmail.com