शरीर में गर्मी बढने पर उसके लिए शारीरिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर करने योग्य विविध उपचार !

१. शरीर की गर्मी न्यून करने हेतु शारीरिक स्तर पर करने योग्य उपचार १ अ. तुलसी के बीजों का सेवन करना : तुलसी के पत्ते गरम व बीज ठंडा होता है । गर्मी न्यून करने हेतु १ चम्मच तुलसी के बीज आधा कटोरा पानी में भिगोएं और सवेरे उसमें १ कटोरा गुनगुना दूध मिलाकर खाली … Read more

चाय पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक !

चाय के दुष्परिणाम      चाय स्वाद में कसैली होने से वह कोष्ठबद्धता निर्माण करती है । कुछ लोगों को चाय न पीने से शौच नहीं होती । आदत पड जाने से ऐसा होता है । शौच का वेग निर्माण करना, चाय का काम नहीं । चाय रक्त में आम्ल बढाती है । नियमित चाय … Read more

आच्छादन : ‘सुभाष पाळेकर प्राकृतिक कृषि तंत्र’ का एक प्रमुख स्तंभ !

भूमि के पृष्ठभाग को ढकना’ अर्थात ‘आच्छादन’ ! भूमि की सजीवता एवं उर्वरता बनाए रखने का कार्य आच्छादन करता है । आच्छादन के कारण ‘सूक्ष्म पर्यावरण की’ निर्मिति सहज होती है । ‘सूक्ष्म पर्यावरण’ अर्थात ‘भूमि के सूक्ष्म जीवाणु एवं केंचुए के कार्य के लिए आवश्यक वातावरण ।

नहाने के जल में एक चम्मच खडा नमक डालें ।

नमक के जल से स्नान करने से संपूर्ण शरीर के १०६ देहशुद्धिकारी चक्रों पर स्थित कष्टदायक शक्तियों का संग्रह नष्ट होता है । फलस्वरूप देहशुद्धिकारी चक्र २ – ३ प्रतिशत जागृत होते हैं एवं कष्टदायक शक्ति शरीर से बाहर निकलती है ।

पोंछा लगाने के संदर्भ में आचार

यंत्र से भूमि पोंछते हुए शरीर अधिकांशतः झुका हुआ नहीं होता, हम खडे-खडे ही भूमि स्वच्छ करते हैं । ऐसे में शरीर की विशिष्ट मुद्रा के अभाव के कारण सूर्यनाडी जागृत नहीं होती । परिणामस्वरूप यंत्र से भूमि पोंछने के कृत्य द्वारा निर्मित कष्टदायक तरंगों से देहमंडलकी भी रक्षा नहीं हो पाती ।

सनातन के आश्रम के लिए ‘फोटोकॉपी मशीन’ क्रय करने के लिए सहायता कीजिए !

सनातन के आश्रमों में समाज को हिन्दू धर्म के प्रति जागृत करने हेतु नियतकालिक प्रकाशित करना, ग्रंथों की निर्मिति करना, साथ ही दृश्यश्रव्य चक्रिकाएं (वीडियो सीडी) तैयार करना आदि सेवाएं संगणक की सहायता से की जाती हैं । इन सेवाओं के लिए A3 और A4 आकार की संगणकीय प्रतियां (जेरॉक्स) निकालनी पडती हैं ।

सनातन के साहित्य में उपयोग की गई संस्कृतनिष्ठ हिन्दी भाषा की कारणमीमांसा

भाषा जितनी अधिक शुद्ध होती है, उतनी ही चैतन्यमय होती है । इस नियम के अनुसार सनातन के साहित्य में शुद्ध हिन्दी का उपयोग किया जाता है । संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का उपयोग किए जाने के कारण पाठकों को भाषा कठिन प्रतीत हो सकती है ।

जीवामृत : सुभाष पाळेकर प्राकृतिक कृषि तंत्र का ‘अमृत’ !

‘पद्मश्री’ पुरस्कार प्राप्त सुभाष पाळेकर ने ‘सुभाष पाळेकर प्राकृतिक कृषि तंत्र’ की खोज की । आज भारत सरकार ने इसका अनुमोदन कर इस तंत्र का प्रसार करने का निश्चय किया है । इस कृषि तंत्र में ‘जीवामृत’ नामक पदार्थ का उपयोग किया जाता है ।

साधकों, ‘छवि बचाना’ के साथ ही अन्य स्वभावदोषों की बलि न चढ, अधिकाधिक लोगों से संपर्क करें !’ – सद्गुरु (सुश्री) स्वाती खाडयेजी, धर्मप्रचारक, सनातन संस्था

उपक्रमों के उपलक्ष्य में समाज के लोगों से संपर्क करने पर ऐसा ध्यान में आया है कि वे हमारी प्रतीक्षा ही कर रहे हैं । इसके विपरीत साधक समाज में जाकर अर्पण मांगने एवं प्रायोजक ढूंढने की सेवा के प्रति उदासीन हैं । साधकों में ‘प्रतिमा संजोना’, अहं का यह पहलू प्रबल होने से वे समाज में जाकर अर्पण मांगने में हिचकिचाते हैं ।

आश्रम में संपन्न कार्यक्रमों के लिए कालीन और पांवडों की आवश्यकता !

रामनाथी, गोवा स्थित सनातन आश्रम में राष्ट्र-धर्म की रक्षा का कार्य किया जाता है । आश्रम में विविध मांगलिक अवसरों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं । उस समय व्यासपीठ पर बिछाने के लिए कालीनों (कार्पेट) की आवश्यकता है । साथ ही, संतों के स्वागत के समय पांवडों की आवश्यकता है ।