विजयादशमीनिमित्त सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का संदेश

‘देवताओं द्वारा आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने का दिन है विजयादशमी ! विजयादशमी का अर्थ है सीमा लांघ कर शत्रु के राज्य में घुसकर विजय प्राप्त करने की परंपरा का स्मरण दिलानेवाला त्योहार ! वर्तमान समय में भी आसुरी शक्तियां भारत का विभाजन करने के लिए आतुर हैं । बांग्लादेश में अराजकता फैली हुई है तथा वहां की आतंकी शक्तियां वहां के अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर अमानवीय अत्याचार कर रही हैं । आतंकवादी शक्तियों ने कश्मीर, असम, बंगाल तथा पूर्वाेत्तर राज्यों को खोखला ही कर दिया है; जबकि भारत के ३० प्रतिशत भूभाग पर नक्सली शक्तियां समानांतर राज कर रही हैं । आतंकी एवं नक्सली शक्तियों के गुप्तचर (जासूस) संपूर्ण भारत में गृहयुद्ध की योजना बना रहे हैं । आतंकी शक्तियां देहली से लेकर गलियों तक दंगे भडकाकर एक प्रकार से सीमा लांघकर हिन्दुओं को परास्त कर रही हैं । शत्रु सीमा लांघ रहा है: अत: हिन्दुओ, ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में आप स्वयं अपनी रक्षा की तैयारी करो !
हिन्दुओ, विजयादशमी क्यों मनाई जाती है ? अथवा अपराजितापूजन एवं शस्त्रपूजन क्यों किया जाता है ?, इसे समझ लो । सच्चा सीमोल्लंघन है, ‘विजय प्राप्त करने के लिए शत्रु की सीमा लांघकर युद्ध की चुनौती देना’, अपराजितादेवी की पूजा करने का अर्थ है, ‘विजय प्राप्त करने के लिए देवी से शक्ति मांगना’ तथा छोटे-बडों को अश्मंतक के पत्ते देने का अर्थ है ‘विजयश्री प्राप्त करने के लिए बडों का आशीर्वाद लेना’ !
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है’, इसकी १८ वर्ष उपरांत हुई प्रतीति !
सात्त्विकता एवं संगठन ही राष्ट्र के उत्कर्ष की चाबी – जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी
भारत पहले से ही जिस जीवन-पद्धति का पालन करता आया है, वही अब पाश्चात्य देश खोजकर अपना रहे हैं !
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों को किया गया अनमोल मार्गदर्शन !
हिन्दू धर्मप्रेमी युवक-युवतियों, ऋषि-मुनियों तथा देवताओं द्वारा की जानेवाली स्थूल कृतियों के पीछेका सूक्ष्म धर्मशास्त्र समझे बिना उनका अनुकरण न करें ! – श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ