
१. ईश्वर सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने के साथ-साथ सर्वव्यापी भी हैं । इस कारण ईश्वरप्राप्ति अर्थात ईश्वर से एकरूप होने के लिए सूक्ष्मातिसूक्ष्म होना, अर्थात शून्य में जाना अथवा सर्वव्यापी होना, ये दो मार्ग हैं । सूक्ष्मातिसूक्ष्म का मार्ग व्यष्टि साधना करनेवालों के लिए होता है, जबकि समष्टि से एकरूप होने हेतु अपनी व्यापकता बढाने का मार्ग समष्टि साधना करनेवालों का होता है । व्यष्टि साधना करते हुए आगे शून्य में जाकर ईश्वर से एकरूप हो सकते हैं । समष्टि साधना करते हुए व्यापकता आती है और अंततः सर्वव्यापी ईश्वर से एकरूप हो सकते हैं ।
२. ईश्वर स्वयं एक ही समय सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं सर्वव्यापी भी होने के कारण, साधक की व्यष्टि अथवा समष्टि साधना मार्गाें के अनुसार वे उसे वैसी अनुभूति प्रदान करते हैं । ईश्वर से एकरूप होने के इच्छुक साधक को भी यदि ये दोनों अनुभूतियां हों, तो वह ईश्वर से शीघ्र एकरूप होता है ।
३. व्यष्टि साधना में ज्ञानमार्ग के अंतर्गत साक्षीभाव एवं भक्तियोग के अंतर्गत ईश्वरेच्छा, ये शब्द उपयुक्त हैं । समष्टि साधना में व्यापकता आने हेतु कर्तव्यकर्म महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है ।
४. व्यष्टि साधना में जीव शरीर अथवा मन, इन सभी से दूर रहकर अकेले ही साधना करता है । इस कारण उसे अन्यों की सहायता नहीं मिल पाती; इसिलिए साधक कुछ वर्ष से लेकर सैकडों वर्ष तक तपस्या करता है, ऐसा हम पढते हैं । इसके विपरीत, समष्टि साधना करनेवाला साधक अन्यों के साथ साधना करता है । इसलिए साधना करते समय भले ही उससे कुछ त्रुटियां हों, तब भी अन्य उसकी सहायता करते हैं । इससे उसकी उन्नति शीघ्र होती है ।
५. ईश्वर अनंत कोटि ब्रह्मांड का कार्य करते हैं, अर्थात उनमें कितना समष्टि भाव है, यह समझ में आता है ।
६. ऋषि-मुनि सहस्रों (हजारों) वर्षाें तक तपस्या करते थे; परंतु समष्टि के हित में यज्ञयाग करना, अध्यात्म सिखाना, इत्यादि भी करते थे । व्यष्टि साधना करनेवालों को यह सूत्र भी ध्यान में रखना चाहिए ।
७. ‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां, उतने साधनामार्ग’, ऐसा सिद्धांत है । इसलिए कुछ लोग व्यष्टि, जबकि कुछ लोग समष्टि साधना करते हैं । ऐसा भले ही हो, तब भी व्यष्टि साधना करनेवालों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति हेतु समष्टि साधना की अपेक्षा उसके लिए उन्हें प्रयास आरंभ करना आवश्यक होता है ।
उपरोक्त कारणों से सनातन संस्था में व्यष्टि के साथ ही समष्टि साधना सिखाई जाती है । इसकी फलोत्पत्ति के रूप में पिछले २६ वर्षाें में कुल १२६४ साधकों ने ६० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया है, अर्थात वे संत होने के मार्ग पर अग्रसर हैं, जबकि १३२ साधक ७० प्रतिशत स्तर से अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर संत बन गए हैं ।
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
कलियुग में समष्टि साधना का महत्त्वसत्ययुग में प्रत्येक व्यक्ति साधना करता था । इसलिए समष्टि साधना अर्थात समाज में जाकर साधना का महत्त्व विशद करना, साधना करना इत्यादि आवश्यक नहीं था । आगे चलकर त्रेतायुग एवं द्वापरयुग में व्यष्टि साधना की मात्रा अत्यधिक अल्प हो गई । कलियुग में तो व्यष्टि साधना की मात्रा ४ – ५ प्रतिशत तक अल्प हो जाने से अन्यों को साधना बताना, अर्थात समष्टि साधना करने की मात्रा अधिक होना आवश्यक हो गया है । उपरोक्त सारणी से ध्यान में आएगा कि कलियुग में समष्टि साधना कितनी महत्त्वपूर्ण है । इसलिए सनातन संस्था जो साधना विशद कर रही है, उसमें समष्टि साधना को प्रधानता दी गई है । – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले |