सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ओजस्वी विचार

‘डॉक्टर अधिक से अधिक व्याधि कम करते हैं; परंतु मृत्यु नहीं टाल सकते । इसके विपरीत, संत जन्म-मृत्यु के चक्र से ही मुक्त करते हैं !’ 

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

ईश्वरप्राप्ति हेतु साधना करनी हो, तो भारत को छोडकर संसार के किसी भी देश में न रहें; क्योंकि भारतीयों की स्थिति भले ही बुरी हो, तब भी भारत जैसा सात्त्विक देश संसार में कहीं नहीं है ।

राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा करें !

‘अब एक-एक रोगी के लिए नहीं, अपितु मरणासन्न स्थिति के राष्ट्र और धर्म के लिए सहस्रों डॉक्टरों की आवश्यकता है !’

जिज्ञासुओ, अध्यात्म के संदर्भ में केवल बौद्धिक जानकारी प्राप्त करने में समय व्यर्थ न कर प्रत्यक्ष साधना करें !

अध्यात्म के संदर्भ में जिज्ञासा रखनेवाले अनेक लोग उससे संबंधित पुस्तकें पढने, प्रवचन सुनने आदि माध्यमों से केवल बौद्धिक स्तर की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

कहां लगभग ३५०० वर्ष पूर्व ही निर्मित हुए विविध धर्म (पंथ), और कहां अनादि अनंत सनातन धर्म !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

‘कहां माता-पिता को निरुपयोगी मानकर वृद्ध आश्रम में भेजनेवाली पश्चिमी विचारधारा की वर्तमान पीढी और कहां ‘यह पूरा विश्व ही मेरा घर है’, ऐसा सिखानेवाली हिन्दू धर्म की अभी तक की पीढियां !’

रज-तम का प्रदूषण सभी प्रदूषणों की जड़ है !

‘ध्वनिप्रदूषण, जलप्रदूषण, वायुप्रदूषण आदि से संबंधित सदैव समाचार आते हैं; परंतु धर्म शिक्षा के अभाव में उनकी जड़ रज-तम के प्रदूषण की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता !’