नई दिल्ली – क्या अंग्रेजी को भारत की ही स्थानीय भाषा माना जा सकता है ?, ऐसा प्रश्न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सी.बी.एस्.ई. – केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) की त्रिभाषा नीति पर प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया । यह नीति वर्तमान २०२६-२७ शैक्षणिक सत्र से लागू की गई है । याचिकाकर्ता ने कहा कि नई नीति के अनुसार विद्यार्थियों को २ भारतीय भाषाएं सीखनी होंगी । उन्हें कक्षा ५ से लगातार पढी जा रही भाषा छोडनी पडेगी । इसके अतिरिक्त अंग्रेजी को ‘गैर-मूल’ (बाहर की)भाषा माना गया है । साथ ही मूल भाषाओं के लिए शिक्षक और पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई ।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि अंग्रेजी पिछले ३०० वर्षों से भारत में बोली जाने वाली भाषा है । नागालैंड तथा मेघालय जैसे राज्यों की वह आधिकारिक राजभाषा है । देश के सभी उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय का कामकाज भी अंग्रेजी में ही चलता है । ऐसी स्थिति में अंग्रेजी को पूरी तरह विदेशी मानकर अलग नहीं किया जा सकता ।
इस पर न्यायालय ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक अंग्रेजी बोलने वाला देश बन चुका है । इसलिए ‘स्थानीय भाषा’ की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है ।
कागज पर २२ भाषाएं, लेकिन पुस्तकें केवल ३ भाषाओं में ।
नियमानुसार विद्यार्थियों को संविधान की २२ आधिकारिक भारतीय भाषाओं में से किसी भी भाषा का चयन करने की स्वतंत्रता कागज पर दी गई है, किंतु वास्तविकता में एन्.सी.ई.आर्.टी. (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग – राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्तमान में केवल ३ भाषाओं की ही पुस्तकें उपलब्ध हैं । आवश्यक आधारभूत सुविधाएं तथा शिक्षक उपलब्ध न होने पर यदि इस नीति को शीघ्रता में लागू किया गया, तो विद्यार्थियों को बडी हानि हो सकती है, ऐसा पक्ष न्यायालय के समक्ष रखा गया ।

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