सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

साधना के संदर्भ में भारत का महत्त्व समझ लें !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

‘ईश्वरप्राप्ति हेतु साधना करनी हो, तो भारत को छोडकर संसार के किसी भी देश में न रहें; क्योंकि भारतीयों की स्थिति भले ही बुरी हो, तब भी भारत जैसा सात्त्विक देश संसार में कहीं नहीं है । अन्य सभी देशों में रज-तम की मात्रा अत्यधिक है; तथापि ५० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त व्यक्ति संसार में कहीं भी रहकर साधना कर सकते हैं ।’


हिन्दुओ, काल के अनुरूप साधना परिवर्तितहोती है, यह ध्यान रखें !

‘संपतकाल में अर्थात प्राचीन युगों में ‘गोदान करना’ साधना थी । वर्तमान आपातकाल में गायों के अस्तित्व का प्रश्न निर्माण हो गया है । ऐसे में ‘गोदान करना’ नहीं; अपितु ‘गोरक्षा करना’ महत्त्वपूर्ण है ।’


जिज्ञासुओ, अध्यात्म के संदर्भ में केवल बौद्धिक जानकारी प्राप्त करने में समय व्यर्थ न कर प्रत्यक्ष साधना करें !

‘अध्यात्म के संदर्भ में जिज्ञासा रखनेवाले अनेक लोग उससे संबंधित पुस्तकें पढना, प्रवचन सुनना आदि माध्यमों से केवल बौद्धिक स्तर की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं । इसलिए उनकी जानकारी में वृद्धि होती है; परंतु उससे साधना नहीं होती  । इसलिए जिज्ञासुओ, हमारे अनेक ऋषि-मुनि एवं संतों ने अध्यात्म एवं साधना के संदर्भ में बहुत कुछ लिख रखा है । उसका अध्ययन कर अधिकाधिक समय उसके अनुसार साधना करने के लिए देना चाहिए । केवल अध्ययन करने में समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए !’


यह पाठशालाओं के लिए लज्जाजनक है !

‘विद्यार्थियों को निजी अनुशिक्षा वर्ग (ट्यूशन) में जाना पडता है, यह पाठशालाओं के लिए अत्यन्त लज्जाजनक है । गुरुकुल काल में निजी अनुशिक्षा वर्ग नहीं थे ।’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले