सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

सर्वधर्मसमभाव !

‘आंगनवाडी के बालक और पदव्युत्तर शिक्षा प्राप्त युवक की शिक्षा समान ही है, ऐसा हम नहीं कहते । वैसी ही स्थिति अन्य तथाकथित धर्म एवं हिन्दू धर्म की होते हुए ‘सर्वधर्मसमभाव’ का घोष करने जैसा दूसरा अज्ञान नहीं है । यह बात विविध धर्मों का अध्ययन करने पर किसी के भी ध्यान में आएगा; परंतु अध्ययन न होने के कारण ‘प्रकाश एवं अंधकार समान हैं’, ऐसा कहनेवाले अंधों के समान ‘सर्वधर्मसमभावी’ हो गए हैं ।

कहां लगभग ३५०० वर्ष पूर्व ही निर्मित हुए विविध धर्म (पंथ), और कहां अनादि अनंत सनातन धर्म !

‘१४०० वर्ष पूर्व इस संसार में एक भी मुसलमान नहीं था, २१०० वर्ष पूर्व इस संसार में एक भी ईसाई नहीं था, २८०० वर्ष पूर्व एक भी बौद्ध अथवा जैन नहीं था तथा ३५०० वर्ष पूर्व इस संसार में एक भी पारसी नहीं था; फिर इसके पूर्व इस संसार में कौन था ? केवल हिन्दू थे । सनातन हिन्दू धर्म अनादि तथा अनंत है और सबका मूल धर्म हिन्दू ही है ।’

अहंकारी बुद्धिवादी !

‘बुद्धिवादियों को अहंकार होता है कि ‘वे सब जानते हैं । फलस्वरूप कुछ जानने की जिज्ञासा न होने के कारण बुद्धि से परे का अध्यात्मशास्त्र उन्हें ज्ञात नहीं होता । तब भी वे अध्यात्म के अधिकारी संतों की आलोचना करते हैं !’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले