आदिवासी छात्रों को अंग्रेजी सिखाने के लिए करोडों रुपए का खर्च, परंतु छात्र मूलभूत सुविधाओं से वंचित ।

‘कैग’ के ब्योरे से आदिवासी विकास विभाग की अंधेरशाही उजागर ।

श्री. प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधि, दैनिक सनातन प्रभात, मुंबई

मुंबई, १५ जुलाई (संवाददाता) – आदिवासी छात्रों को अंग्रेजी माध्यम के अच्छे विद्यालयों में अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा मिले, इसके लिए महाराष्ट्र सरकार की ओर से ‘प्रतिष्ठित अंग्रेजी माध्यम निवासी विद्यालय’ योजना चलाई जाती है । वर्ष २०१८-१९ से वर्ष २०२३-२४ की ६ वर्षाें की अवधि में इस योजना के लिए १ सहस्र ३९८ करोड रुपए से अधिक पैसा व्यय किया गया, परंतु तब भी छात्रों को आवश्यक शैक्षणिक सामग्री न देना, अपात्र विद्यालयों एवं शिक्षकों का चयन करना, छात्रों की प्रवेश प्रक्रिया में विलंब लगाना जैसी अनियमितता हुई हैं, ऐसा ‘भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक’ (कैग) के ब्योरे में उजागर हुआ, जिससे इस योजना में खर्च की गई इतनी बडी राशि निश्चितरूप से गई कहां ?’, इस पर प्रश्नचिन्ह उठा है ।

विधानमंडल के वर्षाकालीन अधिवेशन में १० जुलाई को यह ब्योरा प्रस्तुत किया गया है । इस योजना पर वर्ष २०१८-१९ में २९७ करोड ३४ लाख, वर्ष २०१९-२० में २४१ करोड ४१ लाख रुपए, वर्ष २०२०-२१ में ८५ करोड ३२ लाख रुपए, वर्ष २०२१ में १४९ करोड ९९ लाख रुपए, वर्ष २०२२-२३ में ३२४ करोड ५८ लाख रुपए तथा वर्ष २०२३-२४ में २९९ करोड ९८ लाख रुपए, इतनी बडी धनराशि खर्च की गई । राज्य के ३० आदिवासी बहुल क्षेत्रों में यह योजना चलाई गई ।

श्री. प्रीतम नाचणकर

बिना अध्ययन के ही छात्रों के प्रवेश का लक्ष्य रखना ।

वर्ष २०१५ से पूर्व इस योजना के अंतर्गत नए छात्रों के प्रवेश का वार्षिक लक्ष्य २ सहस्र ५०० था । वर्ष २०१५-१६ से वार्षिक लक्ष्य २५ सहस्र किया गया, परंतु वास्तव में वर्ष २०१८-१९ में २ सहस्र ७७३, वर्ष २०१९-२० में ४ सहस्र ४६६ लक्ष्य था । वर्ष २०२०-२१ में कोरोना महामारी के कारण नए प्रवेश नहीं दिए गए । वर्ष २०२१-२२ में २ सहस्र ७३१, जबकि वर्ष २०२२-२३ में २ सहस्र ५० छात्रों ने प्रवेश लिया । नए छात्रों के प्रवेश का वार्षिक अनुपात ३ से ४ सहस्र था, तो प्रवेश का २५ सहस्र लक्ष्य किस आधार पर निश्चित किया गया ? इससे छात्रों के प्रवेश के विषय में कोई अध्ययन ही नहीं किया है, यह स्पष्ट होता है ।

अंग्रेजी की शिक्षा लिए शिक्षक ही नहीं हैं ।

छात्रों को अंग्रेजी की अच्छी शिक्षा मिले, इसके लिए यह योजना आरंभ की गई, परंतु इसके लिए चयनित कुछ विद्यालयों में अंग्रेजी की शिक्षा के लिए शिक्षक ही उपलब्ध नहीं थे, तब भी इन विद्यालयों को सुयोग्य माना गया । शिक्षकों की नियुक्ति के समय विद्यालयों को संबंधित शिक्षकों की अंग्रेजी भाषा की परीक्षा लेना अनिवार्य था, परंतु वर्ष २०१८-१९ से २०२२-२३ की अवधि में शिक्षकों की परीक्षाएं ही नहीं ली गईं । यह योजना केवल निवासी विद्यालयों के लिए ही थी, परंतु इसमें अनिवासी विद्यालयों का भी समावेश कर वर्ष २०१८ से २०२३ तक की अवधि में ९ विद्यालयों को २४ करोड ९९ लाख रुपए का अनुदान दिया गया । इस अनियमितता के कारण ‘इस योजना की पारदर्शिता संदेह के घेरे में आई’, ऐसा ब्योरे में कहा गया है ।

विद्यालय की श्रेणी के आधार पर योजना के हर लाभधारक छात्र को स्कूलबैग, बूट, लेखनसामग्री, गणवेश आदि के लिए हर विद्यालय को ५० सहस्र रुपए वार्षिक अनुदान दिया गया, परंतु वास्तव में कुछ विद्यालयों में छात्रों को यह सामग्री ही नहीं दी गई, यह चौंकाने वाली वास्तविकता सामने आई । उससे ऐसे विद्यालयों से आर्थिक दंड वसूला गया । कुल मिलाकर सरकार की कोई योजना भले ही अच्छी हो, तब भी भ्रष्टाचार एवं प्रशासनिक अधिकारियों की उपेक्षा की नीति के कारण सरकारी योजना की क्या स्थिति होती है, इसका यह उदाहरण है ।

संपादकीय भूमिका

एक ओर योजना चलाई जाने का दिखावा , जबकि दूसरी ओर छात्रों की शैक्षणिक हानि करते रहना, क्या यह दोहरी नीति नहीं है ? यह तो प्रशासन की असावधानी (लापरवाही) का प्रतीक ।