सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ओजस्वी विचार

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

‘डॉक्टर अधिक से अधिक व्याधि कम करते हैं; परंतु मृत्यु नहीं टाल सकते । इसके विपरीत, संत जन्म-मृत्यु के चक्र से ही मुक्त करते हैं !’


साधना स्वरूप पैसे कमाते समय एवं खर्च करते समय उसमें मन को न उलझाएं !

‘पैसे कमाते समय एवं उसका उपयोग करते समय भी साधना होना आवश्यक है । कर्तव्य स्वरूप सत्मार्ग से पैसे कमाते समय उसके प्रति लोभ न रखें । ‘मेरे प्रारब्धानुसार वह मिलेगा, इसका भान रखना आवश्यक है । कमाए हुए पैसों का उपयोग करते समय भी सुख की आसक्ति न रख प्राप्त सुख में संतुष्ट रहना उचित होता है । आर्थिक व्यवहार करते समय उसमें मन को कम से कम उलझाना खरी साधना है !’


संतों का महत्त्व !

‘डॉक्टर केवल बीमारी को कम कर सकते हैं; परंतु मृत्यु को नहीं टाल सकते । इसके विपरीत, संत जन्म-मृत्यु के चक्र से ही मुक्त करते हैं !’


कहां पश्चिम की समय व्यर्थ करनेवाली शोध की पद्धति और कहां एक क्षण में किसी भी प्रश्न का उत्तर देनेवाली भारतीय साधना !

‘पश्चिम की शोध पद्धति है, ‘जानकारी एकत्र करो, उसका सांख्यिकीय विश्लेषण (statistical analysis) करो और निष्कर्ष निकालो ।’ इसमें अनेक वर्ष लग जाते हैं । इसके विपरीत, साधना में प्रगति होने पर एक क्षण में संसार के किसी भी प्रश्न का उत्तर मिलता है ।’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले