‘आत्मा एक ही है, केवल उसके रूप भिन्न हैं’, यह ज्ञात होने पर द्वैत समाप्त होकर ‘एकत्व साधना’ संभव हो पाता है !
‘देह भले ही भिन्न हो, तब भी सभी में विद्यमान ‘ब्रह्म’ एक ही है’, यह कहकर भैंसे के मुख से भी वेद बुलवानेवाले संत ज्ञानेश्वरजी कहते हैं, ‘‘आत्मा एक ही है । हमारी भिन्न-भिन्न देह के रूप भले ही उसमें समाहित हों, तब भी हममें विद्यमान ईश्वर का आत्मरूप एक ही है ।’’