‘आत्मा एक ही है, केवल उसके रूप भिन्न हैं’, यह ज्ञात होने पर द्वैत समाप्त होकर ‘एकत्व साधना’ संभव हो पाता है !

‘देह भले ही भिन्न हो, तब भी सभी में विद्यमान ‘ब्रह्म’ एक ही है’, यह कहकर भैंसे के मुख से भी वेद बुलवानेवाले संत ज्ञानेश्वरजी कहते हैं, ‘‘आत्मा एक ही है । हमारी भिन्न-भिन्न देह के रूप भले ही उसमें समाहित हों, तब भी हममें विद्यमान ईश्वर का आत्मरूप एक ही है ।’’

‘यदि कृतज्ञभाव में रहें, तो निराशा नहीं आएगी और मन आनंदी होकर साधना और अच्छे से कर सकेंगे !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले

‘साधक स्वभावदोषों की सूची लिखते हैं । वे स्वभावदोष दूर हों, इसलिए स्वसूचनाएं देते हैं । यदि साधकों ने केवल इतना ही किया होता, तो वह उपयुक्त होता; परंतु बहुत-से साधक उन स्वभावदोषों का पूरे दिन स्मरण करते रहते हैं और दुःखी होते हैं ।
कुछ साधक दूसरों के गुणों से या प्रगति से तुलना कर ‘हम उनके पीछे हैं’, ऐसा सोचकर दुःखी होते रहते हैं ।

चाहे हम किसी भी साधनामार्ग से साधना करें, तब भी अखंड साधनारत रहना संभव !

ज्ञानयोगी पढे हुए ज्ञान का चिंतन कर सकता है, कर्मयोगी हो, तो वह प्राप्त परिस्थिति में भी अपेक्षारहित रह सकता है तथा हठयोगी केवल सांस पर ध्यान केंद्रित कर अखंड साधनारत रह सकता है ।

ज्ञान चाहे किसी भी माध्यम से मिले; तब भी वह ईश्वर से ही प्राप्त होने के कारण उससे सीखने में मिलनेवाला आनंद महत्त्वपूर्ण है !

‘साधना में होकर आप हंसमुख नहीं हैं, तो ‘आपकी साधना उचित ढंग से नहीं हो रही है’, ऐसा मान लें तथा प्रयास बढाएं ! –  सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी       

खर्च की तुलना में समष्टि को होनेवाला लाभ महत्वपूर्ण !

महर्षि की आज्ञा से मेरा जन्मदिन प्रतिवर्ष मनाया जा रहा है । इसके लिए थोड़ा अधिक प्रमाण में खर्च भी करना पड़ रहा है, लेकिन खर्च की तुलना में समाज को आध्यात्मिक स्तर पर होने वाला लाभ अधिक है ।

सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी के अनमोल वचन तथा मार्गदर्शन

सुख पाने की अपेक्षा के कारण अन्यों से इच्छा अथवा अपेक्षा करना, यदि हमारे जीवन में दुख तथा अज्ञान निर्माण करता है, तो वह ‘आसक्ति’ है ।

साधको, सनातन के कार्य में योगदान देंगे ऐसे जिज्ञासु एवं शुभचिंतक साधना का आनंद अनुभव कर पाएं, इसलिए उन्हें साधना की अगली दिशा दें !

साधको, ‘सनातन से जुडे पाठक, शुभचिंतक एवं जिज्ञासुओं को साधना की उचित दिशा देकर समष्टि साधना करो और समाज ऋण से मुक्त हों !’

पितृपक्ष की अवधि में ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ नामजप की अपेक्षा ‘ॐ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐ ॐ ।’ नामजप का साधकों पर बहुत अधिक सकारात्मक परिणाम होना

‘समाज के लगभग प्रत्येक व्यक्ति को ही अनिष्ट शक्ति जनित कष्ट होता है । अनिष्ट शक्तियों के कारण व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं, साथ ही जीवन में अन्य समस्याएं भी आती हैं ।

सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी के अमृतवचन !

‘जब (खेत में) नदी का पानी आता है, तब उसे पाट बनाकर दिशा देनी पडती है; अन्यथा वह समस्त (खेत) नष्ट कर देता है । उसीप्रकार मन में आ रहे विचारों को दिशा देनी पडती है ।

अध्यात्म

अध्यात्म विषयक बोधप्रद ज्ञानामृत’ लेखमाला से भक्त, संत तथा ईश्वर, अध्यात्म एवं अध्यात्मशास्त्र तथा चार पुरुषार्थ ऐसे विविध विषयों पर प्रश्नोत्तर के माध्यम से पू. अनंत आठवलेजी ने सरल भाषा में उजागर किया हुआ ज्ञान यहां दे रहे हैं ।