
‘सनातन के कार्य का विस्तार जैसे-जैसे बढता जा रहा है, वैसे-वैसे सनातन के प्रति आस्था रखनेवाले शुभचिंतकों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है । समाज के अनेक जिज्ञासु ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिकों का नियमित वाचन करते हैं । अनेक उद्योगपति एवं अधिवक्ता अपना व्यवसाय संभालकर, संस्था के राष्ट्र-धर्म कार्य में निरपेक्षता से सहायता कर रहे हैं । विज्ञापन देकर अथवा धनरूप में अर्पण कर सनातन के धर्मकार्य में योगदान देनेवाले शुभचिंतकों की संख्या भी अधिक है ।
साधक अनेक बार अंक वितरण, विज्ञापन लाना अथवा अर्पण लेना, इस निमित्त से शुभचिंतकों से मिलते हैं; परंतु इसके अतिरिक्त वैसे भी उनसे मिलना, उन्हें नए उपक्रमों की जानकारी देना, साधना बताना, उनसे अपनेपन का नाता निर्माण करना आदि प्रयत्न नहीं करते । वास्तव में ‘परात्पर गुरु डॉक्टर द्वारा आरंभ किए गए अध्यात्म एवं धर्म प्रसारकार्य सभी तक पहुंचना एवं साधना में रुचि रखनेवाले प्रत्येक जिज्ञासु को योग्य साधनातक ले जाना’, यही साधकों की खरी समष्टि साधना है ।
इस दृष्टि से साधकों को शुभचिंतकों से बीच-बीच में मिलना चाहिए । उनकी रुचि पहचानकर उन्हें साधना की अगली दिशा देनी चाहिए और वे भी साधना का आनंद अनुभव कर पाएं, इसके लिए प्रयत्न करने चाहिए ।
साधको, ‘सनातन से जुडे पाठक, शुभचिंतक एवं जिज्ञासुओं को साधना की उचित दिशा देकर समष्टि साधना करो और समाज ऋण से मुक्त हों !’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२४.३.२०२३)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
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