
१. प्रथम स्तर
‘ध्येय मेें से जो कुछ थोडा-बहुत भी साध्य हुआ हो, उस संदर्भ में संतोष रखें तथा गुरु एवं ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें ।
२. दूसरा स्तर
विफलता के पीछे के कारणों को ढूंढना चाहिए । शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक में से वास्तविक कारण क्या है, इसका चिंतन करें । उन कारणों के अनुसार योग्य उपाय करें । इस संदर्भ में आवश्यकता प्रतीत हो, तो परिजन अथवा सहयोगियों की सहायता लें ।
३. तीसरा स्तर
ऊपर दिए अनुसार कृति करने पर भी विफलता आई, तो उसमें भी आनंदित रहें तथा ऐसा विचार करें कि अब ईश्वर अगले स्तर के प्रयास करना सिखाएंगे ।
ईश्वर का सान्निध्य पाने हेतु ध्येयप्राप्ति के लिए अविरत प्रयास करते रहना आवश्यक है; इसलिए प्रयास करना न छोडें ।’
– (पू.) श्री. संदीप आळशी (२३.३.२०२१) ॐ
अधर्म का उत्तर अधर्म से ही देने की भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा को हिंदुओं द्वारा भुला दिया जाना
नादानुसंधाननादानुसंधान
अर्पणदाताओ, गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में धर्मकार्य हेतु धन अर्पित कर गुरुतत्त्व का लाभ लें !
अधिक मास के निमित्त निरंतर धर्मप्रसार का कार्य करनेवाले सनातन के आश्रमों को अन्नदान देकरपुण्यसंचय के साथ ही आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त करें !
धर्मांधों और साम्यवादियों की दोहरी भूमिका को समझना आवश्यक है !
अधिक मास में सनातन संस्था के ग्रंथ और लघुग्रंथ अन्यों को देकर सर्वश्रेष्ठ ज्ञानदान का फल प्राप्त करें !