कुम्भ मेला : विश्व का सबसे बडा धार्मिक पर्व’

कुम्भ भारतीय संस्कृति में मंगल का प्रतीक है, शगुन का प्रतीक है, शोभा, सौन्दर्य एवं पूर्णत्व का भी प्रतीक है । ‘कुम्भ पर्व’ में जिस ऐतिहासिक कुम्भ का स्मरण किया जाता है, वह अमृत कुम्भ अर्थात ‘सुधा-कलश’ है ।

कुम्भ पर्व की उत्पत्ति की कथा

भगवान विष्णु ने देवताओं पर द्रवित होकर सुमेरू पर्वत की मथानी, वासुकी नाग की रस्सी बनाकर राक्षसों की सहायता से समुद्रमंथन करने का परामर्श दिया । देवताओं ने असुरों को समुद्रमंथन से प्राप्त वस्तुओं को आधा-आधा बांट लेने का प्रलोभन देकर समुद्रमंथन के लिए तैयार कर लिया ।

नागा साधुओं के विषय में विलक्षण जानकारी !

अंग्रेज अधिकारी ने वर्ष १८८८ में ब्रिटिश संसद को भेजे पत्र में लिखा था, ‘नागा साधुओं की शोभायात्रा अश्लीलता नहीं फैलाती । वह सम्पूर्णतया धर्म को समर्पित होती है । अखाडों की परम्पराओं का पालन किया जाता है ।’

कुम्भ मेले में सहभागी होनेवाले विभिन्न अखाडे !

उत्तर भारत से गोदावरी नदी तक निवास करनेवाले सर्व पंथीय साधु कुल १३ संघों में रहते हैं । ये १३ संघ ही १३ ‘अखाडे’ माने जाते हैं । उनके विषय में संक्षिप्त जानकारी हमारे पाठकों के लिए यहां दी है !

‘राजयोगी (शाही) स्नान’ के अवसर पर निकलनेवाली साधुओं की सशस्त्र शोभायात्रा तथा श्रद्धालुओं की असीम भक्ति का दर्शन !

राजयोगी (शाही) स्नान के निमित्त निकलनेवाली साधु-सन्तों की शाही शोभयात्रा तो जैसे तप, ज्ञान, वैराग्य इत्यादि दैवी गुणों की ही शोभायात्रा है !

कल्पवास

कुंभ मेले में कल्पवास एक पवित्र साधना है, जो व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में सहायता करती है । यह एक कठिन व्रत है; परंतु इसका फल मधुर होता है । यदि आप भी कल्पवास करना चाहते हैं तो किसी अनुभवी व्यक्ति का मार्गदर्शन अवश्य लें ।

कुंभ मेले के तीर्थक्षेत्रों की महिमा !

आज हम हरिद्वार के अतिरिक्त अन्य कौन से तीर्थक्षेत्रों पर कुंभ मेले होते हैं, यह समझ लेंगे । साथ ही कुंभ मेले में धार्मिक दृष्टि से स्नान का क्या महत्त्व है, यह भी समझ लेंगे ।

कुम्भ पर्व से हमें कौनसे धार्मिक लाभ होते हैं ?

कुम्भ पर्व अत्यंत पुण्यदायी होने के कारण उस समय प्रयाग, हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिक में स्नान करने से अनंत पुण्यलाभ होता है । इसीलिए करोडों श्रद्धालु एवं साधु-संत इस स्थान पर एकत्रित होते हैं ।

श्रद्धालुओं की सुध-बुध भुलाकर उनमें वैराग्यभाव जागृत करनेवाली गंगास्नान की लगन !

सिंह राशि में गुरु एवं सिंह राशि में ही सूर्य होने पर नासिक-त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ कुम्भपर्व होता है । इसमें भाद्रपद कृष्ण पंचमी, भाद्रपद कृष्ण अमावस्या तथा भाद्रपद शुक्ल पंचमी (केवल नासिक में), जबकि वामन जयंती (केवल त्र्यंबकेश्वर में) को पर्वकाल रहता है ।

अर्धकुम्भ, कुम्भ, पूर्णकुम्भ और महाकुम्भ : जानिए क्या है अंतर

कुम्भ, अर्धकुम्भ, पूर्णकुम्भ और महाकुम्भ में क्या अंतर होता है और इनकी खगोलीय गणना किस आधार पर की जाती है, इस लेख के माध्यम से आपको समझाते हैं ।